दिल्ली में एक जर्जर इमारत के ढहने से हुई दर्दनाक घटना ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी है। बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद लेकर छोटे शहरों और कस्बों से अपने बच्चों को राष्ट्रीय राजधानी भेजने वाले परिवार अब अपने बच्चों के शव लेकर घर लौट रहे हैं। हादसे के बाद इन परिवारों के मन में दुख, गुस्सा और व्यवस्था को लेकर गहरे सवाल हैं।
सत्य निकेतन इलाके में रविवार को दशकों पुरानी एक इमारत के ढहने की घटना में सात लोगों की मौत हो गई। बताया गया कि इस इमारत में छात्रों के रहने की व्यवस्था थी। जिन परिवारों ने अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए दिल्ली भेजा था, उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि बेहतर भविष्य का सपना उन्हें ऐसी त्रासदी के सामने ला खड़ा करेगा।
हादसे के बाद पीड़ित परिवारों में से कई ने दिल्ली में बच्चों को भेजने को लेकर लोगों को सावधान किया है। उनका कहना है कि अगर राजधानी में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो छोटे शहरों के परिवार अपने बच्चों को यहां भेजने से पहले कई बार सोचें।
बेहतर शिक्षा का सपना बन गया त्रासदी
मध्य प्रदेश के देवास से आने वाले भूपेंद्र जाज के परिवार ने भी अपने बेटे अंकित की शिक्षा के लिए काफी संघर्ष किया था। परिवार चाहता था कि उनका बेटा दिल्ली में पढ़ाई करके अपने लिए बेहतर भविष्य बनाए। इसके लिए परिवार ने आर्थिक और व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद उसे राष्ट्रीय राजधानी भेजा।
लेकिन इमारत ढहने की घटना में अंकित की जान चली गई। हादसे में उसकी एक आंख गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई थी, जबकि दूसरी आंख को चिकित्सकों ने दान करने योग्य बताया। परिवार ने भारी दुख के बीच उसकी एक आंख दान करने का निर्णय लिया।
भूपेंद्र जाज ने कहा कि परिवार दिल्ली को लेकर पूरी तरह निराश हो चुका है। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए लोगों से कहा कि वे अपने बच्चों को दिल्ली भेजने से पहले सुरक्षा के बारे में जरूर सोचें।
उनके लिए यह केवल एक बेटे को खोने का दुख नहीं है, बल्कि उन सभी सपनों का टूट जाना भी है, जिन्हें लेकर अंकित दिल्ली आया था।
बेटे का शव तलाशने में भी हुई परेशानी
भूपेंद्र ने बताया कि हादसे के बाद परिवार को अंकित के बारे में जानकारी जुटाने में काफी परेशानी हुई। उनके अनुसार, इमारत ढहने के कुछ समय बाद अंकित के एक मित्र ने परिवार को फोन करके उसके बारे में पूछा था।
उस समय मित्र ने परिवार को आगाह किया कि अगर अंकित अभी भी देवास में है तो उसे सत्य निकेतन क्षेत्र में वापस न जाने दिया जाए। परिवार ने बताया कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि उनका बेटा पहले ही दिल्ली के लिए रवाना हो चुका था और सुबह वहां पहुंच गया था।
हादसे के बाद परिवार को अंकित का शव खोजने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। भूपेंद्र के अनुसार, उन्हें स्पष्ट जानकारी देने वाला कोई नहीं था। परिवार का आरोप है कि उन्हें केवल कुछ तस्वीरें दिखाई गईं, जबकि घटनास्थल पर कई शव मौजूद थे।
यह स्थिति परिवार के दुख को और बढ़ाने वाली थी। एक तरफ वे अपने बेटे को खो चुके थे, दूसरी तरफ उसकी पहचान और शव तक पहुंचने के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा।
परिवार ने की पूरी जांच की मांग
अंकित के परिवार ने इमारत ढहने की घटना की गहन जांच की मांग की है। परिवार का आरोप है कि यदि जर्जर इमारतों की समय रहते पहचान की जाती और सुरक्षा संबंधी कदम उठाए जाते, तो ऐसी घटना को रोका जा सकता था।
अंकित के दादा माखनलाल जाज ने प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया। उनका कहना था कि ऐसी जर्जर इमारतों को तुरंत खाली कराया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को इस तरह का दुख न झेलना पड़े।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हादसे के बाद परिवार को अंकित की तलाश में प्रशासन से पर्याप्त सहायता नहीं मिली। दूर से दिल्ली पहुंचे परिवार के लिए अनजान शहर में अपने बच्चे को तलाशना बेहद कठिन अनुभव था।
आंख दान करने का लिया फैसला
परिवार के लिए बेटे की मौत के बाद आंख दान करने का फैसला बेहद भावुक था। चिकित्सकों ने बताया कि हादसे में अंकित की एक आंख को नुकसान पहुंच चुका था, लेकिन दूसरी आंख दान की जा सकती थी।
परिवार ने उसी समय उसकी आंख दान करने का निर्णय लिया। इस फैसले ने उनके असहनीय दुख के बीच किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में रोशनी की संभावना पैदा की।
ऐसे समय में जब परिवार अपने बेटे की मौत से टूट चुका था, अंगदान का फैसला उनके लिए उसकी स्मृति को किसी सकारात्मक कार्य से जोड़ने का एक माध्यम भी बना।
प्रशासन की जिम्मेदारी पर उठे सवाल
इस घटना ने राजधानी में छात्रों और कामकाजी युवाओं के रहने के लिए इस्तेमाल होने वाली पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। छोटे शहरों से आने वाले परिवार अक्सर अपने बच्चों को छात्रावास, किराये के कमरों या छात्रों के लिए बनी रहने की व्यवस्थाओं में रखते हैं।
इन परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या जिस इमारत में उनके बच्चे रह रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं। अगर किसी भवन की हालत खराब है, तो उसकी समय रहते जांच और आवश्यक कार्रवाई किसकी जिम्मेदारी है, यह भी गंभीर प्रश्न है।
अंकित के दादा ने सभी जर्जर इमारतों को तत्काल खाली कराने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रशासन को हादसे का इंतजार करने के बजाय पहले ही ऐसे भवनों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
टूट गईं परिवार की सारी उम्मीदें
भूपेंद्र जाज ने अपने बेटे को लेकर परिवार की उम्मीदों का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी सारी आशाएं उसी पर टिकी थीं। परिवार ने उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया था।
अब बेटे की मौत के बाद परिवार के सामने भविष्य का सवाल खड़ा हो गया है। जिस बच्चे के माध्यम से माता-पिता अपने परिवार की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद कर रहे थे, वही बच्चा उनसे हमेशा के लिए दूर हो गया।
यह हादसा केवल सात लोगों की जान जाने की घटना नहीं है, बल्कि उन परिवारों के वर्षों के सपनों, मेहनत और उम्मीदों के टूटने की कहानी भी है।
सत्य निकेतन की घटना के बाद पीड़ित परिवारों की आवाज में केवल अपने बच्चों को खोने का दर्द नहीं है, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी भी है। वे चाहते हैं कि इस हादसे की निष्पक्ष और पूरी जांच हो, जिम्मेदारी तय की जाए और राजधानी में छात्रों के लिए सुरक्षित रहने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी दूसरे परिवार को अपने बच्चे को खोकर यह सवाल न पूछना पड़े कि बेहतर भविष्य का सपना इतनी बड़ी कीमत पर क्यों मिला।


