Wednesday, November 4, 2026

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बीसीसीआई सख्त, टीम इंडिया के फिटनेस मानकों में होगा बड़ा बदलाव, खिलाड़ियों के लिए लागू होंगे नए नियम

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों की फिटनेस को लेकर गंभीर चिंता जताई है। हाल के अंतरराष्ट्रीय दौरों के दौरान खिलाड़ियों में लगातार चोटें, मैदान पर थकान, बार-बार ऐंठन (क्रैम्प्स) और फील्डिंग स्तर में गिरावट देखने के बाद बोर्ड ने अब फिटनेस व्यवस्था की व्यापक समीक्षा शुरू कर दी है। इसके तहत बेंगलुरु स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (Centre of Excellence – CoE) में खिलाड़ियों के प्रशिक्षण और कंडीशनिंग प्रोटोकॉल को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, बीसीसीआई चाहता है कि भारतीय टीम के सभी खिलाड़ी समान फिटनेस मानकों का पालन करें, चाहे वे वरिष्ठ खिलाड़ी हों या नए सदस्य। बोर्ड का मानना है कि एक समान और पारदर्शी फिटनेस प्रणाली से खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता में सुधार होगा, चोटों का जोखिम कम होगा और टीम का प्रदर्शन बेहतर हो सकेगा।

फिटनेस व्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव

अब तक कुछ खिलाड़ियों के लिए उनकी भूमिका या अनुभव के आधार पर अलग-अलग फिटनेस मानदंड अपनाए जाने की बात सामने आती रही है। नई व्यवस्था में इस प्रणाली को समाप्त कर सभी खिलाड़ियों के लिए एक समान न्यूनतम फिटनेस स्तर (Standardised Fitness Benchmark) तय करने की योजना बनाई गई है।

इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर खिलाड़ी एक जैसी शारीरिक क्षमता के साथ मैदान में उतरे और किसी भी खिलाड़ी को उसकी वरिष्ठता या प्रतिष्ठा के आधार पर अलग मानक न दिए जाएं।

यो-यो टेस्ट की जगह अब ब्रोंको टेस्ट

टीम इंडिया के स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच एड्रियन ले रूक्स (Adrian Le Roux) की निगरानी में अब यो-यो टेस्ट (Yo-Yo Test) की जगह ब्रोंको टेस्ट (Bronco Test) को प्रमुख फिटनेस मूल्यांकन प्रणाली के रूप में अपनाया जा रहा है।

ब्रोंको टेस्ट खिलाड़ियों की सहनशक्ति (Endurance), गति, फुर्ती (Agility) और रिकवरी क्षमता को बेहतर तरीके से परखने वाला टेस्ट माना जाता है।

रिपोर्टों के अनुसार नए मानकों में—

खिलाड़ियों को ब्रोंको टेस्ट लगभग 5.15 से 5.20 मिनट के भीतर पूरा करना होगा।
इसके अलावा 2 किलोमीटर की दौड़ 9 से 10 मिनट के भीतर पूरी करनी होगी।

इन मानकों का उद्देश्य खिलाड़ियों को अधिक प्रतिस्पर्धी और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की शारीरिक चुनौतियों के लिए तैयार करना है।

हालिया दौरों ने बढ़ाई चिंता

बीसीसीआई की यह समीक्षा ऐसे समय में शुरू हुई है जब हाल के विदेशी दौरों, विशेषकर इंग्लैंड दौरे के दौरान कई भारतीय खिलाड़ियों को मैदान पर शारीरिक समस्याओं का सामना करते देखा गया।

रिपोर्टों के अनुसार—

कई खिलाड़ियों को मैच के दौरान बार-बार क्रैम्प्स आए।
कुछ खिलाड़ियों की फुर्ती पहले की तुलना में कम दिखाई दी।
बल्लेबाजों को विकेटों के बीच तेज दौड़ने में कठिनाई हुई।
फील्डिंग के दौरान प्रतिक्रिया समय (Reaction Time) भी प्रभावित होता नजर आया।

इन घटनाओं ने टीम प्रबंधन और बोर्ड दोनों का ध्यान खिलाड़ियों की फिटनेस पर दोबारा केंद्रित किया है।

पुराने फिटनेस सिस्टम पर उठे सवाल

रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि पहले सभी खिलाड़ियों का मूल्यांकन एक जैसे मानकों पर नहीं किया जाता था।

कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों को फिटनेस टेस्ट में अपेक्षाकृत आसान लक्ष्य दिए जाने की बात सामने आई है। वहीं, कुछ खिलाड़ियों को पूरी तरह फिट नहीं होने के बावजूद टीम में शामिल किए जाने के आरोप भी लगे हैं।

इसी वजह से बोर्ड के भीतर यह राय बनी कि फिटनेस प्रणाली अधिक पारदर्शी, समान और जवाबदेह होनी चाहिए, ताकि किसी भी खिलाड़ी के साथ अलग व्यवहार की गुंजाइश न रहे।

हालांकि, बीसीसीआई की ओर से इन दावों पर विस्तृत आधिकारिक टिप्पणी सार्वजनिक रूप से जारी नहीं की गई है।

फिजियो की भूमिका भी चर्चा में

रिपोर्टों के अनुसार, टीम के फिजियो कमलेश जैन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

बताया गया है कि बोर्ड और टीम प्रबंधन ने खिलाड़ियों की गिरती फिटनेस को लेकर उनसे जवाब मांगा है।

अधिकारियों की चिंता मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर केंद्रित बताई गई है—

मैचों के दौरान खिलाड़ियों को बार-बार ऐंठन होना।
फील्डिंग का स्तर गिरना।
बल्लेबाजों की रनिंग बिटवीन द विकेट्स में कमी।
टीम में अपेक्षाकृत धीमे फील्डरों की संख्या बढ़ना।

रिपोर्टों के अनुसार, फिजियो को यह भी कहा गया है कि वे खिलाड़ियों की प्रतिष्ठा या अनुभव से प्रभावित हुए बिना फिटनेस संबंधी कमियों की स्पष्ट जानकारी दें।

हर्षित राणा का मामला बना चर्चा का विषय

युवा तेज गेंदबाज हर्षित राणा का मामला भी इस पूरी समीक्षा का प्रमुख उदाहरण माना जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, हालिया दौरे के चयन के समय उनका वजन निर्धारित सीमा से लगभग 4 किलोग्राम अधिक था।

बताया गया कि चयन के समय उनका वजन करीब 97 किलोग्राम था, लेकिन उन्हें टीम के साथ जाने की अनुमति मिल गई।

बाद में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने उनके लिए अधिकतम 96 किलोग्राम का लक्ष्य तय किया। अब रिपोर्टों के अनुसार उनका वजन घटकर 94 किलोग्राम हो गया है और वे जल्द ही पूरी फिटनेस मंजूरी हासिल कर सकते हैं।

हालांकि, इस मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि खिलाड़ियों की फिटनेस की निगरानी कितनी सख्ती से की जा रही थी।

बीसीसीआई का दीर्घकालिक लक्ष्य

आधुनिक क्रिकेट में खिलाड़ियों को तीनों प्रारूपों—टेस्ट, वनडे और टी20—में लगातार खेलना पड़ता है। व्यस्त अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम, लंबी यात्राएं और लगातार मैच खिलाड़ियों पर अतिरिक्त शारीरिक दबाव डालते हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए बीसीसीआई अब ऐसी फिटनेस संस्कृति विकसित करना चाहता है जो केवल चयन तक सीमित न होकर पूरे करियर के दौरान खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता बनाए रखे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नई प्रणाली प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो इसके कई संभावित लाभ हो सकते हैं—

खिलाड़ियों में चोटों का जोखिम कम हो सकता है।
मैदान पर गति और फुर्ती में सुधार हो सकता है।
लंबे टूर्नामेंटों में सहनशक्ति बढ़ सकती है।
टीम में पेशेवर अनुशासन और जवाबदेही मजबूत हो सकती है।
प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
आगे की राह

बीसीसीआई द्वारा फिटनेस मानकों की समीक्षा भारतीय क्रिकेट के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि सभी खिलाड़ियों के लिए समान मानक लागू किए जाते हैं और उनका सख्ती से पालन कराया जाता है, तो इससे भारतीय टीम की शारीरिक तैयारी और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत हो सकती है।

हालांकि, रिपोर्ट में उल्लिखित कुछ दावे—जैसे खिलाड़ियों को अलग-अलग मानकों पर परखा जाना या कुछ चयन निर्णयों के कारण—स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुए हैं। इसलिए इन पहलुओं पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित आधिकारिक स्पष्टीकरण या बीसीसीआई के औपचारिक बयान के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे। फिलहाल इतना तय है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड अब फिटनेस को टीम चयन और प्रदर्शन का एक केंद्रीय आधार बनाने की दिशा में गंभीरता से काम कर रहा है।

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