देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की प्रस्तावित व्यवस्था लागू होती है, तो इसका असर केवल चुनाव की तारीखों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि कई मौजूदा राज्य सरकारों के कार्यकाल पर भी पड़ सकता है। केंद्र सरकार एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था को वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ लागू करने की संभावनाओं पर विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है, तो अलग-अलग वर्षों में चुनी गई कई राज्य विधानसभाओं को एक साझा चुनाव चक्र में लाना होगा।
मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। कुछ राज्यों में चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं, जबकि कई राज्यों में विधानसभा का चुनाव उससे एक, दो या तीन वर्ष पहले या बाद में होता है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत इन अलग-अलग चुनाव चक्रों को एक समय पर लाने के लिए एक बार के लिए कई राज्यों के कार्यकाल में बदलाव करना पड़ सकता है।
संविधान संशोधन विधेयक के प्रस्ताव के अनुसार, निर्धारित तिथि के बाद गठित राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल की समाप्ति के साथ समाप्त किया जा सकता है। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि कुछ सरकारों को सामान्य पांच वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले ही विधानसभा चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
वर्ष 2029 का चुनाव क्यों महत्वपूर्ण
वर्ष 2029 में लोकसभा का चुनाव प्रस्तावित व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकता है। यदि उस समय लोकसभा के साथ अधिकतर राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी कराए जाते हैं, तो देश का चुनावी कैलेंडर एक साझा चक्र में आ सकता है।
लेकिन वर्तमान स्थिति में सभी राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल एक ही समय पर समाप्त नहीं होता। उदाहरण के लिए, कुछ राज्यों में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं। सामान्य स्थिति में वहां चुनी गई सरकार 2033 तक पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर सकती है। लेकिन यदि वर्ष 2029 में ही अगला विधानसभा चुनाव करा दिया जाता है, तो उस सरकार को लगभग एक वर्ष के भीतर ही चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
इसी तरह जिन राज्यों में 2026 या 2027 में सरकारें बनेंगी, उन्हें भी सामान्य पांच वर्ष की अवधि से कम समय के बाद दोबारा जनता के पास जाना पड़ सकता है।
वर्ष 2028 में चुनाव वाले राज्यों पर सबसे अधिक असर
प्रस्तावित बदलाव का सबसे बड़ा तत्काल प्रभाव उन राज्यों पर पड़ सकता है जहां विधानसभा चुनाव वर्ष 2028 में होने वाले हैं। यदि इन राज्यों को वर्ष 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ दिया जाता है, तो नई सरकारों को सामान्य पांच वर्ष के बजाय लगभग एक वर्ष ही शासन करने का अवसर मिलेगा।
इन राज्यों में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, मिजोरम और तेलंगाना जैसे राज्य शामिल हैं।
इन राज्यों में यदि निर्धारित समय के अनुसार चुनाव वर्ष 2028 में होते हैं और उसके तुरंत बाद वर्ष 2029 में दोबारा विधानसभा चुनाव कराए जाते हैं, तो चुनाव चक्र को एक साथ लाने के लिए सरकारों का कार्यकाल काफी छोटा हो जाएगा।
यह स्थिति राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि कोई भी नई सरकार अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों में ही अगले चुनाव की तैयारी करने के लिए मजबूर हो सकती है।
वर्ष 2027 में चुनाव वाले राज्यों पर भी असर
वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले राज्यों को भी प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अपना कार्यकाल कम होने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में निर्धारित चुनाव वर्ष 2027 के आसपास हैं। यदि इन राज्यों की नई विधानसभाओं को वर्ष 2029 में लोकसभा के साथ भंग कर दिया जाता है, तो सरकारों को लगभग दो वर्ष ही शासन करने का अवसर मिल सकता है।
सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। ऐसे में वर्ष 2027 में चुनी गई सरकार के लिए वर्ष 2029 में चुनाव कराना उसके सामान्य कार्यकाल में लगभग तीन वर्ष की कटौती के बराबर होगा।
हालांकि अंतिम व्यवस्था इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित कानून किस रूप में लागू होता है और चुनाव चक्र को मिलाने के लिए कौन-सी संवैधानिक तथा कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है।
वर्ष 2026 में चुनाव वाले राज्यों की स्थिति
वर्ष 2026 में विधानसभा चुनाव वाले राज्यों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में वर्ष 2026 में सरकारें चुनी जानी हैं। पुडुचेरी में भी इसी चुनाव चक्र के दौरान विधानसभा चुनाव होना है।
यदि इन सरकारों का कार्यकाल वर्ष 2029 में लोकसभा के साथ समाप्त किया जाता है, तो उन्हें लगभग तीन वर्ष शासन करने के बाद फिर से चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
सामान्य पांच वर्ष के कार्यकाल की तुलना में यह लगभग दो वर्ष की कटौती होगी। इसका अर्थ यह होगा कि वर्ष 2026 में जनता द्वारा चुनी गई सरकार को वर्ष 2029 में फिर से जनादेश लेना पड़ सकता है।
यह व्यवस्था राजनीतिक दलों के लिए भी बड़ी चुनौती हो सकती है, क्योंकि उन्हें चुनावी तैयारी के लिए अपेक्षाकृत कम समय मिलेगा।
बिहार और दिल्ली पर भी पड़ सकता है असर
वर्ष 2025 में चुनाव कराने वाले बिहार और दिल्ली को भी संभावित बदलाव से पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता। यदि वर्ष 2029 में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होती है, तो इन दोनों जगहों की सरकारों को लगभग चार वर्ष का कार्यकाल मिल सकता है।
इस स्थिति में सामान्य पांच वर्ष की अवधि की तुलना में करीब एक वर्ष की कटौती होगी। हालांकि यहां भी अंतिम स्थिति प्रस्तावित कानून के लागू होने की वास्तविक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
इसलिए केवल चुनाव वर्ष के आधार पर यह निश्चित नहीं माना जा सकता कि किसी सरकार को अनिवार्य रूप से कितने समय बाद भंग किया जाएगा। संवैधानिक प्रावधानों, नियुक्त तिथि और चुनाव चक्र को मिलाने की अंतिम व्यवस्था महत्वपूर्ण होगी।
किन राज्यों पर शायद असर नहीं पड़ेगा
एक देश, एक चुनाव लागू होने पर हर राज्य की सरकार का कार्यकाल कम करना जरूरी नहीं होगा। कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं।
आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम में वर्ष 2024 के आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी कराए गए थे। इसलिए ऐसे राज्यों का चुनाव चक्र पहले से ही लोकसभा के चुनाव चक्र के करीब है।
इन राज्यों के लिए अलग से बड़ा बदलाव करने की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो सकती है। प्रस्तावित व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य उन राज्यों के चुनाव चक्र को एक साथ लाना होगा जिनके विधानसभा चुनाव अलग-अलग वर्षों में होते हैं।
एक देश, एक चुनाव का प्रस्ताव क्या बदल सकता है
एक देश, एक चुनाव का मूल विचार यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ या एक समन्वित चुनाव चक्र में कराए जाएं। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च कम हो सकता है और सरकारों को लगातार चुनावी तैयारियों के बजाय शासन पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिल सकता है।
बार-बार चुनाव होने के कारण राजनीतिक दलों को लगातार प्रचार अभियान चलाना पड़ता है। इसके अलावा चुनावी आचार संहिता लागू होने से सरकारी नीतियों और नई घोषणाओं पर भी कुछ समय के लिए प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर, आलोचकों का मानना है कि अलग-अलग राज्यों के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय चुनावी मुद्दों के बीच दब सकते हैं। इसके अलावा किसी राज्य सरकार का कार्यकाल जनता के सामान्य पांच वर्ष के जनादेश से पहले समाप्त करना संघीय व्यवस्था और राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता से जुड़े सवाल भी पैदा कर सकता है।
कार्यकाल कम होने का संवैधानिक सवाल
यदि वर्ष 2029 को साझा चुनाव चक्र का आधार बनाया जाता है, तो एक बार के लिए कई सरकारों का कार्यकाल छोटा करना पड़ सकता है। यह इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक पहलू है।
उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2028 में चुनी गई सरकार को सामान्य स्थिति में वर्ष 2033 तक काम करना चाहिए। लेकिन यदि उसे वर्ष 2029 में ही विधानसभा चुनाव के लिए भंग करना पड़े, तो उसके पास लगभग एक वर्ष का कार्यकाल ही बचेगा।
इसी तरह वर्ष 2027 में चुनी गई सरकार को लगभग दो वर्ष और वर्ष 2026 में चुनी गई सरकार को लगभग तीन वर्ष के बाद चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
इस एक बार के समायोजन के बाद भविष्य में यदि सभी चुनाव एक समान चक्र में आ जाते हैं, तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक निर्धारित अंतराल पर साथ कराए जा सकते हैं।
राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती
प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करना होगा। अभी राज्य चुनावों और लोकसभा चुनावों के बीच पर्याप्त अंतर होता है। अलग-अलग राज्यों में स्थानीय मुद्दों, नेतृत्व और राजनीतिक समीकरणों के अनुसार दल अपनी रणनीति बनाते हैं।
एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रचार अभियान एक ही समय में चल सकते हैं। इससे राजनीतिक दलों को संगठनात्मक और आर्थिक स्तर पर अधिक व्यापक तैयारी करनी होगी।
मतदाताओं के सामने भी राष्ट्रीय और राज्य स्तर के मुद्दे एक साथ होंगे। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि मतदाता दोनों स्तरों के लिए अलग-अलग प्राथमिकताओं को समझ सकें।
आगे की राह क्या होगी
एक देश, एक चुनाव की दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल राजनीतिक सहमति ही पर्याप्त नहीं होगी। संविधान और चुनाव संबंधी कानूनों में आवश्यक बदलाव, संसद की प्रक्रिया, राज्यों की भूमिका और चुनाव आयोग की तैयारियां भी महत्वपूर्ण होंगी।
सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग कार्यकाल वाली विधानसभाओं को एक साझा चुनाव चक्र में लाना है। इसके लिए एक बार का संक्रमण काल आवश्यक हो सकता है, जिसमें कुछ सरकारों का कार्यकाल छोटा और कुछ का अपेक्षाकृत लंबा किया जाए।
वर्ष 2029 में यदि यह व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम बढ़ता है, तो 2026, 2027 और 2028 में चुनी जाने वाली कई राज्य सरकारों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। खास तौर पर 2028 में चुनाव वाले राज्यों के लिए यह बदलाव सबसे बड़ा होगा, क्योंकि उनकी नई सरकारों को सामान्य पांच वर्ष के बजाय लगभग एक वर्ष में ही दोबारा चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए एक देश, एक चुनाव केवल चुनाव की तारीखें बदलने की योजना नहीं है। यह भारत के पूरे चुनावी ढांचे, राज्य सरकारों के कार्यकाल और राजनीतिक दलों की रणनीति में व्यापक बदलाव ला सकता है। अंतिम तस्वीर संसद में होने वाली प्रक्रिया, संवैधानिक संशोधनों और चुनाव चक्र को एक साथ लाने के लिए तय किए जाने वाले नियमों के बाद ही स्पष्ट होगी।


