Wednesday, November 4, 2026

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शी चिनफिंग भारत आएंगे, 2019 की मुलाकात पर टिकी नजरें

भारत और चीन के संबंधों को लेकर लंबे समय से जारी अटकलों पर अब विराम लग गया है। चीन ने पुष्टि कर दी है कि राष्ट्रपति शी चिनफिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आएंगे। यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि शी चिनफिंग लगभग सात वर्ष बाद भारत की यात्रा करेंगे।

चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर शी चिनफिंग नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। उनकी यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद के कारण संबंधों में काफी तनाव रहा है, लेकिन हाल के समय में दोनों देशों के बीच संवाद और संबंध सुधारने की कोशिशें भी दिखाई दी हैं।

शी चिनफिंग की भारत यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भी नई दिल्ली में मौजूद रहेंगे। ऐसे में शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकों पर पूरी दुनिया की नजर रहने की संभावना है।

सात साल बाद भारत आएंगे चीनी राष्ट्रपति

शी चिनफिंग की पिछली भारत यात्रा अक्टूबर 2019 में हुई थी। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति के बीच तमिलनाडु के मामल्लपुरम में अनौपचारिक शिखर वार्ता हुई थी।

उस मुलाकात के लिए दिल्ली के बजाय मामल्लपुरम को चुना गया था। यह स्थान अपने प्राचीन मंदिरों और शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है। वहां स्थित सातवीं और आठवीं शताब्दी के शैल मंदिर और नक्काशीदार स्मारक विश्व धरोहर के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।

मामल्लपुरम में आयोजित मुलाकात का उद्देश्य औपचारिक कूटनीतिक माहौल से अलग दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद और विश्वास का वातावरण तैयार करना था। दोनों नेताओं ने ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया और भारतीय संस्कृति तथा तमिल परंपरा से परिचित हुए।

प्रधानमंत्री मोदी ने उस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में शी चिनफिंग का स्वागत किया था। दोनों नेताओं ने मंदिर परिसर का दौरा किया और सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

छह घंटे तक हुई थी मोदी-शी बातचीत

2019 की उस यात्रा में दोनों नेताओं के बीच अलग-अलग चरणों में लगभग छह घंटे तक बातचीत हुई थी। वार्ता का मुख्य उद्देश्य भारत और चीन के बीच संबंधों के लिए नया अध्याय शुरू करना था।

दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ाने के साथ-साथ व्यापार घाटे पर भी चर्चा हुई थी। उस समय भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा लगभग 11 अरब डॉलर के आसपास था। अब यह अंतर काफी बढ़ चुका है।

दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसी कारण इस बार की मुलाकात में व्यापार संतुलन, निवेश और आपूर्ति व्यवस्था जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

2019 की बैठक में आतंकवाद के खिलाफ सहयोग पर भी चर्चा हुई थी। हालांकि, उस समय कोई बड़ा समझौता या महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने नहीं आया था। दोनों देशों की रणनीति तत्काल किसी बड़ी घोषणा के बजाय नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद और विश्वास बढ़ाने की थी।

2019 के बाद बदले भारत-चीन संबंध

मामल्लपुरम की मुलाकात के कुछ ही महीनों बाद भारत और चीन के संबंधों में भारी तनाव पैदा हुआ। जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई।

इस घटना में 20 भारतीय सैनिकों की मृत्यु हुई, जबकि चीनी पक्ष को भी नुकसान हुआ। यह कई दशकों में दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकरावों में से एक था।

इसके बाद भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों में तनाव बढ़ गया। दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास बड़ी संख्या में सैनिकों और सैन्य संसाधनों की तैनाती कर दी।

सीमा पर तनाव का असर केवल सैन्य संबंधों तक सीमित नहीं रहा। भारत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए चीन से जुड़े कई मोबाइल अनुप्रयोगों पर भी प्रतिबंध लगाया। दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट गहरा गया।

धीरे-धीरे शुरू हुआ संबंध सुधार

लंबे सैन्य तनाव के बाद 2021 में दोनों पक्षों के बीच कुछ क्षेत्रों से सैनिकों की वापसी शुरू हुई। हालांकि सीमा विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ और समय-समय पर तनाव की स्थिति बनी रही।

बाद के वर्षों में दोनों देशों ने संवाद के रास्ते खुले रखने की कोशिश की। उच्चस्तरीय संपर्क धीरे-धीरे बढ़े और सीमा पर कुछ क्षेत्रों में सैन्य तनाव कम करने के प्रयास किए गए।

2024 में प्रधानमंत्री मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात के बाद भी दोनों देशों के संबंधों में सुधार की उम्मीद जगी थी। अब 2026 में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान शी की भारत यात्रा को उस प्रक्रिया की अगली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

इस बार मुद्दे पहले से कहीं अधिक जटिल

इस बार मोदी और शी के सामने 2019 की तुलना में कहीं अधिक जटिल परिस्थितियां हैं। सबसे बड़ा अंतर दोनों देशों के बीच बढ़ता व्यापार घाटा और सीमा विवाद का अब भी पूरी तरह हल न होना है।

इसके अलावा वैश्विक राजनीति भी तेजी से बदल रही है। यूक्रेन में जारी युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष और अमेरिका की व्यापार नीतियों ने दुनिया की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित किया है।

ऐसे समय में भारत और चीन दोनों के सामने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर साझा चुनौतियां हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच रणनीतिक अविश्वास अभी भी मौजूद है, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियां सहयोग की कुछ नई संभावनाएं भी पैदा कर सकती हैं।

पुतिन और पेजेशकियन से भी होगी मोदी की मुलाकात

ब्रिक्स सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मौजूदगी भी इसे महत्वपूर्ण बनाती है। प्रधानमंत्री मोदी दोनों नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत कर सकते हैं।

रूस के साथ भारत के लंबे समय से मजबूत संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ भारत के आर्थिक और क्षेत्रीय हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में नई दिल्ली में होने वाली बैठकों में व्यापार, ऊर्जा, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक संघर्षों जैसे मुद्दे उठ सकते हैं।

क्या इस बार रिश्तों में नया अध्याय शुरू होगा?

2019 में मोदी और शी की मुलाकात का उद्देश्य व्यक्तिगत विश्वास और बेहतर संवाद का वातावरण तैयार करना था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद सीमा पर हुए गंभीर सैन्य टकराव ने उस प्रक्रिया को लगभग खत्म कर दिया।

2026 की मुलाकात के सामने चुनौती इसलिए कहीं बड़ी है। दोनों नेताओं को केवल व्यक्तिगत संबंध सुधारने की कोशिश नहीं करनी होगी, बल्कि सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक अविश्वास जैसे ठोस मुद्दों पर भी आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना होगा।

शी चिनफिंग की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दोनों देश एक-दूसरे से पूरी तरह दूर भी नहीं जा सकते और पूरी तरह भरोसा भी नहीं कर सकते। वैश्विक व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा और बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां दोनों को संवाद के करीब ला रही हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई दिल्ली में मोदी और शी के बीच होने वाली बातचीत 2019 की तरह केवल सद्भावना और व्यक्तिगत संवाद तक सीमित रहेगी, या इस बार दोनों देश अपने जटिल संबंधों को वास्तविक समाधान की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठा पाएंगे।

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