गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, समृद्धि और शुभता का देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है कि भगवान गणेश की आराधना करने से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश चतुर्थी पर्व की शुरुआत होती है। वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु अपने घरों और सार्वजनिक पूजा स्थलों पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करेंगे। इसके बाद विधि-विधान से पूजा, आरती और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे।
गणेश चतुर्थी का धार्मिक महत्व तो प्राचीन समय से रहा है, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस पर्व को सामाजिक और राष्ट्रीय एकता से भी जोड़ा गया। वर्ष 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को बड़े सार्वजनिक आयोजन का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका उद्देश्य लोगों को एकजुट करना और सामाजिक एकता को मजबूत करना था। समय के साथ यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ कला, संगीत, संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।
गणेश चतुर्थी 2026 की चतुर्थी तिथि
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी की चतुर्थी तिथि *14 सितंबर को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि *15 सितंबर को सुबह 7 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि और धार्मिक परंपराओं के अनुसार गणेश चतुर्थी का मुख्य पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा।
इस दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए दोपहर का समय विशेष रूप से शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी स्थानीय पंचांग गणना के अनुसार पूजा और प्रतिमा स्थापना का समय निर्धारित कर सकते हैं।
अलग-अलग शहरों में गणेश स्थापना का शुभ मुहूर्त
गणेश प्रतिमा की स्थापना के लिए वर्ष 2026 में अलग-अलग शहरों में शुभ समय इस प्रकार बताया गया है।
नई दिल्ली: सुबह 11 बजकर 2 मिनट से दोपहर 1 बजकर 31 मिनट तक।
मुंबई: सुबह 11 बजकर 20 मिनट से दोपहर 1 बजकर 48 मिनट तक।
पुणे: सुबह 11 बजकर 16 मिनट से दोपहर 1 बजकर 44 मिनट तक।
कोलकाता: सुबह 10 बजकर 18 मिनट से दोपहर 12 बजकर 46 मिनट तक।
प्रतिमा स्थापना से पहले पूजा स्थल को साफ करके पवित्र किया जाता है। इसके बाद वहां भगवान गणेश की प्रतिमा को विधि-विधान से स्थापित किया जाता है। श्रद्धालु भगवान गणेश को फूल, दूर्वा, अक्षत, मोदक और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं।
गणेश स्थापना की धार्मिक विधि
जिस स्थान पर भगवान गणेश की प्रतिमा के लिए पूजा मंडप बनाया गया हो, वहां सबसे पहले पवित्र स्वस्तिक बनाया जाता है। इसके बाद स्वस्तिक पर फूल और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा को सम्मानपूर्वक स्थापित किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा का मुख उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि उत्तर दिशा भगवान गणेश के निवास से जुड़ी हुई है। प्रतिमा स्थापित करने के बाद भगवान गणेश का आवाहन कर उनकी विधिवत पूजा की जाती है। इसके बाद दीप जलाकर आरती की जाती है और भक्त भगवान गणेश से परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
कितने दिनों तक मनाया जाता है गणेश उत्सव?
गणेश उत्सव सामान्य रूप से दस दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत गणेश चतुर्थी के दिन प्रतिमा स्थापना के साथ होती है। इन दिनों घरों, मंदिरों और सार्वजनिक पूजा पंडालों में भगवान गणेश की विशेष पूजा की जाती है। श्रद्धालु प्रतिदिन आरती करते हैं और भगवान को विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित करते हैं।
दस दिनों के उत्सव के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। वर्ष 2026 में मुख्य विसर्जन तिथि 25 सितंबर, शुक्रवार बताई गई है। विसर्जन के दौरान श्रद्धालु भावुक होकर भगवान गणेश को अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण देते हैं। इस अवसर पर ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयघोष के साथ प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है।
गणेश चतुर्थी पर व्रत रखने वाले रखें इन बातों का ध्यान
गणेश चतुर्थी के अवसर पर अनेक श्रद्धालु भगवान गणेश के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए व्रत रखते हैं। व्रत की अवधि व्यक्ति अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार तय कर सकता है। कोई पूरे दिन उपवास रखता है, तो कोई आधे दिन या निश्चित समय तक ही व्रत करता है।
व्रत के दौरान मन और शरीर की शुद्धता पर विशेष ध्यान देने की धार्मिक मान्यता है। श्रद्धालुओं को नकारात्मक विचारों, अनावश्यक विवाद, चुगली और मानसिक तनाव से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। व्रत रखने वाले लोग सामान्यतः मांसाहारी भोजन से पूरी तरह परहेज करते हैं। कई श्रद्धालु प्याज और लहसुन का सेवन भी नहीं करते।
व्रत के भोजन में सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल किया जाता है। हल्का और सात्त्विक भोजन करना उचित माना जाता है। भोजन में कम तेल और कम मसालों का उपयोग किया जाता है। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू और अन्य व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थों का सेवन किया जा सकता है।
जो लोग निर्जल व्रत रखते हैं, उन्हें अपनी शारीरिक क्षमता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। लंबे समय तक पानी न पीने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इसलिए निर्जल व्रत रखने से पहले और व्रत समाप्त होने के बाद पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आवश्यक है। किसी भी प्रकार का कठोर उपवास करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।
गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित पर्व नहीं है। यह परिवार और समाज को एक साथ जोड़ने वाला त्योहार भी है। घरों और सार्वजनिक स्थलों पर होने वाली पूजा के माध्यम से लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं। इसके साथ ही यह पर्व भारतीय कला, संगीत, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस वर्ष 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के अवसर पर श्रद्धालु भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना करेंगे और 25 सितंबर को मुख्य विसर्जन के साथ उत्सव का समापन होगा।


