Saturday, September 5, 2026

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चीन पर निर्भरता से यूरोप को बड़ा झटका लगा : बेल्जियम प्रधानमंत्री

नई दिल्ली में भारत दौरे पर पहुंचे बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने चीन पर यूरोप की लंबे समय से चली आ रही आर्थिक निर्भरता को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि यूरोप ने चीन से जुड़ी आर्थिक निर्भरता के संभावित खतरों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया और अब उसे इसका गंभीर परिणाम समझ में आ रहा है। बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने यूरोप के इस अनुभव को एक ऐसे कठोर जागरण के रूप में बताया, जिसने महाद्वीप को अपनी आर्थिक और औद्योगिक रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।

नई दिल्ली में भारतीय उद्योग परिसंघ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डी वेवर ने कहा कि यूरोप ने लंबे समय तक ऐसे उत्पादों और औद्योगिक क्षमता को अपने बाजारों में प्रवेश करने दिया, जो बहुत कम कीमतों पर उपलब्ध कराए जा रहे थे। इससे यूरोपीय उद्योगों पर दबाव बढ़ा और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थानीय उत्पादन क्षमता कमजोर होती चली गई।

बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में चीन का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया। उन्होंने उस देश को संकेत के रूप में एक ऐसे पड़ोसी के तौर पर संदर्भित किया, जिसे सभी जानते हैं। उनके बयान को स्पष्ट रूप से चीन की ओर संकेत के रूप में देखा गया।

भारत ने पहले ही खतरे को पहचान लिया था

डी वेवर ने भारत की आर्थिक और रणनीतिक सोच की विशेष रूप से प्रशंसा की। उन्होंने स्वीकार किया कि भारत ने यूरोप से पहले ही अत्यधिक आर्थिक निर्भरता के जोखिम को पहचान लिया था और नई दिल्ली ने यूरोपीय देशों को इस संबंध में चेतावनी भी दी थी।

बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने इस खतरे को यूरोप से पहले समझ लिया था। उनके अनुसार भारत ने यूरोपीय देशों को सावधान किया, लेकिन उस समय यूरोप ने इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काफी पहले यूरोपीय नेताओं के साथ बातचीत में अत्यधिक आर्थिक निर्भरता को लेकर चिंता व्यक्त की थी। डी वेवर के मुताबिक अब यूरोप इन बातों को सुन रहा है और परिस्थितियों को नए नजरिये से देख रहा है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब यूरोपीय देश अपनी आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित और विविध बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते व्यापार तनाव, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने यूरोप को अपनी निर्भरता की समीक्षा करने के लिए प्रेरित किया है।

सस्ते आयात से कमजोर हुआ यूरोपीय उद्योग

डी वेवर ने यूरोप की उस आर्थिक नीति पर भी सवाल उठाया जिसके तहत विदेशी उत्पादों को बड़े पैमाने पर यूरोपीय बाजारों में जगह मिली। उनके अनुसार कम कीमतों पर आने वाली अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता ने यूरोपीय कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन बना दी।

यदि किसी देश के उद्योग को लगातार ऐसे उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़े जो बहुत कम कीमत पर उपलब्ध हों, तो घरेलू उत्पादन और निवेश पर असर पड़ सकता है। समय के साथ इससे उत्पादन क्षमता घट सकती है और किसी महत्वपूर्ण वस्तु के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता बढ़ सकती है।

बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने इसी समस्या को यूरोप की वर्तमान रणनीतिक चुनौती से जोड़ते हुए कहा कि आर्थिक निर्भरता केवल व्यापार का विषय नहीं है। यदि किसी आवश्यक वस्तु, कच्चे माल या तकनीक के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता हो जाए तो वह निर्भरता भविष्य में राजनीतिक या आर्थिक दबाव का माध्यम भी बन सकती है।

राजनीतिक दबाव का साधन न बने आर्थिक निर्भरता

डी वेवर ने कहा कि यूरोप ऐसी स्थिति नहीं चाहता जिसमें महत्वपूर्ण आर्थिक निर्भरताओं का इस्तेमाल राजनीतिक या आर्थिक दबाव बनाने के लिए किया जा सके।

इसी वजह से यूरोप अब अपनी आपूर्ति व्यवस्था में विविधता लाने पर जोर दे रहा है। इसका उद्देश्य किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और भरोसेमंद साझेदार देशों के साथ दीर्घकालिक संबंध मजबूत करना है।

इस रणनीति में भारत को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। डी वेवर ने भारत को यूरोप की प्राथमिक साझेदारियों में सबसे ऊपर बताते हुए कहा कि भारत उनकी सूची में पहले स्थान पर है।

भारत के साथ बढ़ेगा रणनीतिक सहयोग

बेल्जियम के प्रधानमंत्री के बयान से यह संकेत भी मिलता है कि भारत और यूरोप के बीच आर्थिक संबंध आने वाले समय में और गहरे हो सकते हैं। दोनों पक्ष ऐसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं जिनका संबंध आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से है।

इन क्षेत्रों में अर्धचालक, रक्षा उत्पादन, औषधि उद्योग, हरित ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, उन्नत तकनीक और समुद्री सुरक्षा प्रमुख हैं।

अर्धचालक और महत्वपूर्ण खनिज जैसे क्षेत्र आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। इनके उत्पादन और आपूर्ति में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से वैश्विक उद्योगों को संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसी कारण भारत जैसे बड़े और विविध अर्थतंत्र के साथ साझेदारी यूरोपीय देशों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर जोर

डी वेवर की भारत यात्रा के दौरान भारत और बेल्जियम के बीच व्यापार तथा रक्षा संबंधों को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री के बीच द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को विस्तार देने के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत हुई।

दोनों देशों के बीच सहयोग के साथ-साथ भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में जारी प्रयासों को समर्थन देने पर भी चर्चा हुई। ऐसा समझौता दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत लंबे समय से यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को व्यापक बनाने पर जोर देता रहा है। दूसरी ओर यूरोप भी एशिया में ऐसे साझेदारों की तलाश कर रहा है जो बड़े बाजार के साथ-साथ विश्वसनीय उत्पादन और आपूर्ति क्षमता प्रदान कर सकें।

चीन की औद्योगिक क्षमता बनी यूरोप की चिंता

बेल्जियम के प्रधानमंत्री का बयान यूरोप में चीन को लेकर बढ़ती व्यापक चिंता के बीच आया है। यूरोपीय देशों में चीन की औद्योगिक अतिरिक्त क्षमता, व्यापार असंतुलन और महत्वपूर्ण कच्चे माल तथा उत्पादों की आपूर्ति को लेकर निर्भरता पर लगातार चर्चा हो रही है।

विशेष रूप से ऊर्जा परिवर्तन, तकनीकी उत्पादन, औषधि निर्माण और उन्नत उद्योगों के लिए आवश्यक कुछ महत्वपूर्ण संसाधनों की आपूर्ति में चीन की बड़ी भूमिका ने यूरोपीय नीति निर्माताओं का ध्यान खींचा है।

यूरोप अब ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाना चाहता है जिसमें व्यापार जारी रहे, लेकिन किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता न हो। इसके लिए नए साझेदारों के साथ व्यापार, निवेश और उत्पादन संबंध मजबूत करने की रणनीति अपनाई जा रही है।

भारत के लिए बढ़ता रणनीतिक महत्व

बेल्जियम के प्रधानमंत्री की टिप्पणी भारत के बढ़ते आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व को भी रेखांकित करती है। भारत एक बड़े उपभोक्ता बाजार के साथ-साथ विनिर्माण, औषधि, तकनीक, रक्षा और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।

यूरोप के लिए भारत के साथ मजबूत संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। आपूर्ति व्यवस्था की सुरक्षा, महत्वपूर्ण संसाधनों की उपलब्धता, तकनीकी सहयोग और समुद्री सुरक्षा जैसे विषय भी दोनों पक्षों के साझा हितों का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

डी वेवर का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें यूरोप की पिछली आर्थिक रणनीति को लेकर आत्ममंथन दिखाई देता है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब यूरोप की आर्थिक विविधीकरण रणनीति में एक प्रमुख साझेदार के रूप में उभर रहा है।

यूरोप चीन के साथ आर्थिक संबंध पूरी तरह समाप्त करने के बजाय अपनी निर्भरता को संतुलित करने और जोखिम कम करने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस बदलती रणनीति में भारत की भूमिका आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण हो सकती है।

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