आरजी कर चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल की 31 वर्षीय स्नातकोत्तर प्रशिक्षु चिकित्सक के बलात्कार और हत्या के मामले में करीब दो साल बाद एक बार फिर जांच को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं। मामले में दोषी ठहराए गए संजय रॉय को निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, लेकिन पीड़िता के परिवार की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जाता रहा है कि क्या जांच में सामने आए सभी तथ्यों और संभावित आरोपियों की भूमिका की पूरी तरह पड़ताल हुई।
मामले में नई जांच को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय के हालिया निर्देशों ने इन सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। मई 2026 में उच्च न्यायालय ने मामले में कथित तौर पर घटनाओं को दबाने या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ किए जाने के आरोपों की जांच के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम गठित करने का आदेश दिया। टीम को चिकित्सक के अंतिम बार जीवित देखे जाने से लेकर शव के अंतिम संस्कार तक की घटनाओं की कड़ी की जांच करने को कहा गया है।
अप्रैल 2026 में उच्च न्यायालय ने संजय रॉय से दोबारा पूछताछ की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की मांग को भी मंजूरी दी थी। अदालत ने यह संभावना मानी कि रॉय के पास मामले से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी हो सकती है और आवश्यकता पड़ने पर अन्य संदिग्धों से भी पूछताछ की जा सकती है।
परिवार के सवाल अब भी कायम
पीड़िता के परिवार का लंबे समय से कहना है कि मामले की जांच में कई महत्वपूर्ण सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। परिवार की ओर से आगे की जांच की मांग करते हुए यह भी कहा गया कि कुछ ऐसे गवाहों से पर्याप्त पूछताछ नहीं हुई, जो घटनाक्रम के महत्वपूर्ण हिस्सों पर प्रकाश डाल सकते थे।
इनमें अस्पताल में पीड़िता के साथ भोजन करने वाले सहकर्मी, नर्स, चिकित्सा सहायक और उस क्षेत्र से जुड़े अन्य लोग शामिल बताए गए हैं। जांच अधिकारियों के सामने इन लोगों के बयान घटनाओं की समयरेखा और अस्पताल परिसर में उस रात की गतिविधियों को समझने में उपयोगी हो सकते हैं।
पूर्व और वर्तमान पुलिस अधिकारियों के एक वर्ग का भी मानना है कि किसी मामले में छूटे हुए गवाहों की दोबारा जांच से नई जानकारी सामने आ सकती है। अलग-अलग गवाहों के बयानों में यदि कोई महत्वपूर्ण अंतर मिलता है, तो वह जांच की दिशा को प्रभावित कर सकता है।
घटना की रात क्या हुआ था?
घटना 8 और 9 अगस्त 2024 की दरम्यानी रात हुई थी। पीड़िता ने अस्पताल में कुछ सहकर्मियों के साथ भोजन किया था। इसके बाद वह अस्पताल के सभागार कक्ष में चली गई थी, जहां अगले दिन उसका शव मिला।
घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। चिकित्सकों और चिकित्सा समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। मामला जल्द ही पश्चिम बंगाल के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हो गया।
प्रारंभिक जांच कोलकाता पुलिस ने की थी, लेकिन बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देश पर जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी गई।
संजय रॉय को दोषी ठहराया गया
मामले में पुलिस से जुड़े नागरिक स्वयंसेवक संजय रॉय को गिरफ्तार किया गया था। बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जांच के आधार पर उसके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया।
जनवरी 2025 में सियालदह की निचली अदालत ने संजय रॉय को बलात्कार और हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने उसे जीवन के अंतिम समय तक कारावास में रखने की सजा दी थी।
इसके बाद सजा और दोषसिद्धि को लेकर उच्च न्यायालय में अपीलें दाखिल हुईं। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने भी मृत्युदंड की मांग से संबंधित अपील की, जबकि संजय रॉय की ओर से भी दोषसिद्धि को चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की अपील स्वीकार की थी।
हालांकि पीड़िता का परिवार लगातार यह सवाल उठाता रहा है कि क्या अपराध में केवल एक व्यक्ति शामिल था या जांच में अन्य संभावित भूमिकाओं की भी पर्याप्त पड़ताल हुई।
फिर से जांच क्यों महत्वपूर्ण है?
नई जांच का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में घटनाओं की पूरी श्रृंखला को स्थापित करना जरूरी होता है। केवल मुख्य अपराध की जांच ही नहीं, बल्कि घटना से पहले और बाद में हुए प्रत्येक महत्वपूर्ण घटनाक्रम की भी पड़ताल की आवश्यकता होती है।
उच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल को कथित रूप से साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ और घटनाओं को दबाने के आरोपों की जांच करनी है। इसके अलावा चिकित्सक के अंतिम बार जीवित देखे जाने और अंतिम संस्कार के बीच की घटनाओं को भी जांच के दायरे में रखा गया है।
यदि इस प्रक्रिया में कोई नया तथ्य सामने आता है, तो वह मामले की आगे की कानूनी कार्यवाही के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी जांच का हिस्सा
मामले की दोबारा जांच में इलेक्ट्रॉनिक और तकनीकी साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। अस्पताल परिसर में लगे निगरानी कैमरों की रिकॉर्डिंग, मोबाइल फोन से संबंधित जानकारी और उस समय क्षेत्र में मौजूद लोगों की गतिविधियों से जुड़े तकनीकी आंकड़े घटनाक्रम को समझने में सहायता कर सकते हैं।
पहले की जांच में भी बड़े पैमाने पर निगरानी कैमरों की सामग्री की जांच किए जाने की जानकारी सामने आई थी। अब यदि किसी नए व्यक्ति, समय या गतिविधि को लेकर सवाल उठते हैं, तो उपलब्ध तकनीकी सामग्री की दोबारा समीक्षा उपयोगी हो सकती है।
हालांकि किसी भी तकनीकी सामग्री को अदालत में उपयोगी बनाने के लिए उसकी प्रामाणिकता और कानूनी स्वीकार्यता स्थापित करना आवश्यक होगा।
अंतिम संस्कार को लेकर भी उठे सवाल
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू शव के अंतिम संस्कार से जुड़ा है। परिवार और अन्य पक्षों की ओर से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया और उससे पहले की घटनाओं को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
उच्चतम न्यायालय ने मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच की निगरानी की थी। इस दौरान शव को परिवार को सौंपे जाने और प्राथमिकी दर्ज किए जाने के समय के बीच के अंतर सहित कई घटनाक्रम चर्चा में आए थे।
अब नई विशेष जांच में अंतिम संस्कार तक की घटनाओं की पूरी कड़ी की जांच किए जाने से इस पहलू पर भी अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है।
क्या नई जांच से न्याय की राह मजबूत होगी?
इस सवाल का निश्चित उत्तर फिलहाल देना संभव नहीं है। नई जांच से कोई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएगा या नहीं, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
यदि नए गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री या अन्य साक्ष्य पहले की जांच में छूटे हुए किसी महत्वपूर्ण पहलू को स्थापित करते हैं, तो इससे मामले की तस्वीर बदल सकती है। दूसरी ओर, यदि नई जांच में पहले के निष्कर्षों की ही पुष्टि होती है, तब भी यह प्रक्रिया परिवार के उठाए गए सवालों का जवाब देने में मदद कर सकती है।
पीड़िता के परिवार के वकील का कहना है कि परिवार ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को पर्याप्त सामग्री उपलब्ध कराई है। उनका दावा है कि विशेषज्ञों की राय, निगरानी कैमरों की सामग्री और घटनास्थल से जुड़े गवाहों की जानकारी जांच एजेंसी के सामने रखी गई है।
उच्च न्यायालय ने जांच की प्रगति पर भी चिंता जताई
नई जांच की दिशा में अदालत की सक्रियता के बावजूद प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे हैं। जून 2026 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कथित साजिश और घटनाओं को दबाने से संबंधित जांच की प्रगति पर असंतोष जताया था। अदालत ने कहा था कि जांच लंबे समय से चल रही है और उसे जल्द अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।
इससे संकेत मिलता है कि अदालत केवल नई जांच शुरू करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उसके परिणाम और समयबद्ध प्रगति पर भी नजर रख रही है।
न्याय के लिए आगे क्या जरूरी है?
पीड़िता के परिवार के लिए न्याय का अर्थ केवल एक व्यक्ति को सजा मिलना नहीं है। परिवार यह जानना चाहता है कि अपराध की पूरी सच्चाई क्या थी, क्या किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका थी, क्या कोई साक्ष्य प्रभावित हुआ और घटना के बाद सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुसार पूरी की गईं या नहीं।
इसलिए नई जांच को निष्पक्ष, तथ्य आधारित और प्रमाणों पर केंद्रित रखना महत्वपूर्ण होगा। जांच में किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सभी संबंधित गवाहों, दस्तावेजों, तकनीकी सामग्री और घटनाओं की समयरेखा की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी होगी।
आरजी कर मामला पहले ही देश में महिलाओं की सुरक्षा, चिकित्सकों की कार्यस्थल सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस पैदा कर चुका है। अब नई जांच से उम्मीद है कि लंबे समय से अनुत्तरित सवालों को स्पष्ट करने की दिशा में ठोस प्रगति होगी।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि नई जांच से परिवार को पूर्ण न्याय मिलेगा या नहीं। लेकिन उच्च न्यायालय के नए निर्देशों और दोबारा पूछताछ की अनुमति ने मामले के उन पहलुओं की फिर से पड़ताल का रास्ता जरूर खोला है, जिन्हें परिवार लंबे समय से महत्वपूर्ण मानता रहा है। अंतिम निष्कर्ष जांच और अदालत की प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
नोट: आपके मूल पाठ में “सुवेंदु अधिकारी” को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बताया गया था। उपलब्ध आधिकारिक राज्य सरकार के वर्तमान पृष्ठों के अनुसार अगस्त 2026 में सुवेंदु अधिकारी ही मुख्यमंत्री हैं, इसलिए मैंने इस विवरण को वर्तमान स्थिति के अनुसार रखा है।


