14 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने देशभर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक अस्थायी मंच पर लेटे हुए थे। उनके आसपास चिकित्सकों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी। 17 दिनों से केवल पानी के सहारे चल रहे उनके अनिश्चितकालीन अनशन का असर अब उनके स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा था।
लगातार उपवास के कारण उनका वजन आठ किलोग्राम से अधिक कम हो चुका था। डॉक्टरों के अनुसार उनका रक्तचाप 109/70 दर्ज किया गया। लंबे समय तक भोजन न लेने के कारण उनके शरीर में कमजोरी बढ़ गई थी और उनकी आवाज भी इतनी धीमी हो गई थी कि उन्हें बोलने में कठिनाई हो रही थी। उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए मेडिकल टीम चौबीसों घंटे उनके साथ मौजूद रही ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
सोनम वांगचुक का यह अनशन धीरे-धीरे एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका था। शुरुआत में सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं के बीच शुरू हुई यह मुहिम अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई। जंतर-मंतर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के विपक्षी नेता, फिल्म जगत से जुड़े कलाकार, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठन, छात्र संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार पहुंचकर अपना समर्थन जता रहे थे। प्रदर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर सरकार से आंदोलनकारियों की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील कर रहे थे।
59 वर्षीय सोनम वांगचुक ने 28 जून 2026 को अपना अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया था। उन्होंने यह फैसला उस आंदोलन में शामिल होने के लिए लिया जिसका नेतृत्व ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ नामक एक युवा-नेतृत्व वाले व्यंग्यात्मक राजनीतिक समूह द्वारा किया जा रहा था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य कथित NEET-UG मेडिकल प्रवेश परीक्षा प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर जवाबदेही तय करना और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करना था।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। उनका मानना था कि परीक्षा से जुड़े विवादों ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों के भविष्य को प्रभावित किया है। इसी कारण आंदोलन को छात्रों और युवाओं का व्यापक समर्थन भी मिला।
15 जुलाई 2026 तक जंतर-मंतर पर चल रहा यह धरना 25वें दिन में प्रवेश कर चुका था। आंदोलनकारियों का दावा था कि इतने लंबे समय के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से कोई वरिष्ठ अधिकारी प्रदर्शन स्थल पर बातचीत के लिए नहीं पहुंचा। न ही सरकार की ओर से आंदोलन की मांगों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक की गई। इसी बात को लेकर प्रदर्शनकारियों में निराशा भी दिखाई दी, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी मुहिम शांतिपूर्ण ढंग से जारी रहेगी।
सोनम वांगचुक का नाम देशभर में शिक्षा सुधार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। उन्होंने लद्दाख में नवाचार आधारित शिक्षा, टिकाऊ विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर लंबे समय से काम किया है। उनके विचारों और अभियानों ने देश-विदेश में भी पहचान बनाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक केवल पानी के सहारे रहने वाला अनशन स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। लगातार उपवास के कारण शरीर में ऊर्जा की कमी, मांसपेशियों का क्षय, रक्तचाप में गिरावट और अन्य जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में डॉक्टर लगातार उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रहे हैं और आवश्यक चिकित्सकीय परीक्षण भी किए जा रहे हैं।
इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों से सामाजिक संगठनों, छात्र समूहों और कई सार्वजनिक हस्तियों ने आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया है। कई लोगों ने सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दिया है ताकि शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकाला जा सके।
आने वाले दिनों में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी रहेंगी कि सरकार इस आंदोलन पर क्या रुख अपनाती है और सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति में क्या बदलाव आता है। फिलहाल उनका अनशन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है और इससे जुड़े घटनाक्रम पर लगातार नजर रखी जा रही है।


