महाराष्ट्र में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ मारपीट की बढ़ती घटनाओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को बेहद कड़ा रुख अपनाया। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर हमला करने वाले राजनीतिक नेताओं या कार्यकर्ताओं के मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ऐसे लोगों को तत्काल हिरासत में लिया जाना चाहिए और उन्हें खुलेआम घूमने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायालय की यह सख्त टिप्पणी महाराष्ट्र के पालघर में अस्पताल परिसर में हुई कथित मारपीट की घटना के सामने आने के बाद हुई।
सर्वोच्च न्यायालय में सोमवार को शिवसेना के पार्षद रमेश सुखर्या म्हात्रे से जुड़ी याचिका पर सुनवाई चल रही थी। म्हात्रे को छह जुलाई को ठाणे के डोंबिवली स्थित कल्याण-डोंबिवली नगर निगम के शास्त्री नगर अस्पताल में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ कथित मारपीट के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने बंबई उच्च न्यायालय द्वारा जमानत देते समय लगाई गई कड़ी शर्तों को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
बंबई उच्च न्यायालय की शर्तों में यह भी कहा गया था कि म्हात्रे महाराष्ट्र में निवास नहीं कर सकते। म्हात्रे की ओर से न्यायालय में यह मांग रखी गई थी कि उन्हें मुंबई आने की अनुमति दी जाए। हालांकि, सोमवार की सुनवाई के दौरान उनके पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख के बाद अपनी याचिका वापस लेने की इच्छा जताई।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने डॉक्टरों पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि परिस्थितियां लगातार खराब होती जा रही हैं। उन्होंने हाल में पालघर के एक अस्पताल में सामने आई घटना का भी उल्लेख किया, जिसकी खबरें माध्यमों में आई थीं। बताया गया कि पालघर के अस्पताल में रविवार को शिवसेना से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर एक स्वागत कक्ष कर्मचारी को थप्पड़ मारा और एक महिला कर्मचारी को धमकी दी।
डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों के साथ इस तरह के व्यवहार पर सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद गंभीर चिंता व्यक्त की। पीठ ने संकेत दिया कि यदि कोई राजनीतिक प्रभाव रखने वाला व्यक्ति अस्पताल में जाकर चिकित्सकों या कर्मचारियों के साथ मारपीट करता है, तो उसके साथ सामान्य तरीके से पेश नहीं आया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपियों को तत्काल हिरासत में लिया जाना चाहिए और उन्हें स्वतंत्र रूप से घूमने नहीं दिया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुकुल रोहतगी ने कहा कि वह अपने पक्ष की याचिका वापस लेना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने मामले में दस दिनों के भीतर आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है और आरोपी के जल्द ही दोषसिद्ध होने की संभावना है।
इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि दोषसिद्धि होती है तो होने दीजिए। न्यायालय ने संकेत दिया कि मामले में एक स्पष्ट संदेश जाना जरूरी है। पीठ ने कहा कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कठोर रुख अपनाया जाना आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इस प्रकार की घटनाओं को लेकर एक प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने बंबई उच्च न्यायालय द्वारा म्हात्रे को दी गई जमानत के खिलाफ अपील दायर की है और सर्वोच्च न्यायालय उस पर सुनवाई करेगा। न्यायालय ने राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी करने का भी संकेत दिया।
जब मुकुल रोहतगी ने म्हात्रे की याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, तब पीठ ने कहा कि यदि वह अपनी याचिका वापस लेना चाहते हैं तो न्यायालय उन्हें नहीं रोकेगा। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से दायर अपील पर न्यायालय अपनी कार्यवाही जारी रखेगा।
इस पूरे मामले में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों को डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अस्पतालों में चिकित्सक और कर्मचारी मरीजों के उपचार तथा उनकी देखभाल में लगे रहते हैं। ऐसे में उनके साथ मारपीट या धमकी की घटनाएं न केवल उनके व्यक्तिगत सम्मान और सुरक्षा का सवाल उठाती हैं, बल्कि अस्पतालों के सामान्य कामकाज को भी प्रभावित कर सकती हैं।
महाराष्ट्र में सामने आई घटनाओं के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का रुख यह संकेत देता है कि राजनीतिक पहचान या प्रभाव के आधार पर किसी आरोपी को कानून की प्रक्रिया से अलग नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि डॉक्टरों पर हमले के मामलों में कठोर संदेश जाना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।
फिलहाल म्हात्रे की ओर से दायर याचिका वापस लेने की बात सामने आई है, जबकि राज्य सरकार की ओर से उनकी जमानत के खिलाफ दायर अपील पर सर्वोच्च न्यायालय आगे सुनवाई करेगा। इस मामले में न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर सभी की नजरें रहेंगी। साथ ही, महाराष्ट्र में अस्पताल कर्मचारियों की सुरक्षा और राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर की जाने वाली हिंसक घटनाओं पर प्रशासन की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


