Saturday, September 12, 2026

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इलाज की देरी पर निजी अस्पताल को 43.36 लाख रुपये

तेलंगाना राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने चिकित्सकीय लापरवाही के एक मामले में निजी अस्पताल को जिम्मेदार ठहराते हुए मृतक के परिवार को 43.36 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि 52 वर्षीय एन. देवेंद्र राव में मस्तिष्काघात के लक्षण सामने आने के बाद उपचार के बेहद महत्वपूर्ण शुरुआती समय को अस्पताल की ओर से गंवा दिया गया। आयोग ने इस अवधि को चिकित्सा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समय पर उचित उपचार नहीं मिलने से मामले की गंभीरता बढ़ी।

यह मामला मार्च 2013 का है। देवेंद्र राव को 22 मार्च को दोपहर के भोजन के बाद घर पर अचानक मस्तिष्काघात जैसे लक्षण महसूस हुए थे। परिवार के अनुसार, उन्हें तत्काल सिकंदराबाद स्थित संबंधित निजी अस्पताल की शाखा में ले जाया गया। बताया गया कि वह दोपहर करीब डेढ़ बजे से दो बजे के बीच अस्पताल पहुंचे थे। इसके बाद उन्हें अस्पताल की जुबली हिल्स स्थित दूसरी शाखा में स्थानांतरित किया गया। बाद में लंबे उपचार के बावजूद 19 अक्टूबर 2013 को उनकी मृत्यु हो गई।

मृतक की पत्नी, बेटे और बेटी ने अस्पताल, वहां के चिकित्सकों तथा कर्मचारियों के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। परिवार ने चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हुए 1.11 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी, हालांकि बाद में दावा एक करोड़ रुपये तक सीमित कर दिया गया।

उपचार के महत्वपूर्ण समय में हुई देरी

आयोग ने मामले की सुनवाई के दौरान अस्पताल के चिकित्सकीय अभिलेखों में कई गंभीर विसंगतियां पाईं। आयोग के अनुसार, रोगी के अस्पताल पहुंचने और उसके बाद उपचार शुरू होने के समय को लेकर अभिलेखों में स्पष्टता नहीं थी। तारीखों और समय में काट-छांट तथा दोबारा लिखे जाने के निशान भी पाए गए।

आयोग ने विशेष रूप से इस बात पर नाराजगी जताई कि सिकंदराबाद शाखा के मूल आपातकालीन उपचार संबंधी अभिलेख अस्पताल ने प्रस्तुत नहीं किए। इसके कारण आयोग के सामने यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया कि रोगी जब पहली बार अस्पताल पहुंचा, तब उसकी वास्तविक स्थिति क्या थी और वहां उसे तत्काल कौन-कौन सा उपचार दिया गया।

इसके बाद जब रोगी को जुबली हिल्स स्थित शाखा में ले जाया गया, तब भी चिकित्सकीय अभिलेखों में समय को लेकर कई सवाल उठे। आयोग ने पाया कि कुछ प्रविष्टियां दर्ज किए गए प्रवेश समय से पहले की दिखाई दे रही थीं। तारीख और समय में सुधार तथा ऊपर से लिखे गए विवरण ने मामले में देरी की आशंका को और मजबूत किया।

एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय अभिलेख में शाम करीब छह बजे यह दर्ज किया गया था कि रोगी को रक्त का थक्का घोलने वाली चिकित्सा इसलिए नहीं दी गई क्योंकि उपचार की निर्धारित समय-सीमा निकल चुकी थी। आयोग ने इसी बिंदु को बेहद महत्वपूर्ण माना, क्योंकि यदि रोगी में मस्तिष्काघात के लक्षण लगभग डेढ़ बजे शुरू हुए थे तो शुरुआती महत्वपूर्ण अवधि में उपचार के लिए पर्याप्त समय मौजूद था।

दवाओं के अभिलेख ने भी उठाए सवाल

आयोग ने दवाओं से संबंधित अभिलेखों की भी जांच की। अभिलेख के अनुसार शाम करीब साढ़े छह बजे रक्त को पतला करने वाली दवा क्लेक्सेन दी गई थी। वहीं शाम छह बजे नस के माध्यम से दिए जाने वाले द्रव से संबंधित प्रविष्टि काट दी गई थी।

आयोग ने पाया कि दर्द और बुखार के लिए दी जाने वाली दवा को छोड़कर शुरुआती कई घंटों में बहुत कम औषधियों का उल्लेख था। शाम सात बजकर 13 मिनट पर पहली अन्य प्रमुख दवा दिए जाने की प्रविष्टि दर्ज थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए आयोग ने उपचार में हुई देरी को गंभीर माना।

आयोग ने 20 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि रोगी को उपचार की महत्वपूर्ण प्रारंभिक अवधि में उचित चिकित्सा नहीं दी गई। अभिलेखों में सुधार, काट-छांट और समय को लेकर मौजूद विसंगतियों ने देरी से जुड़ी चिंताओं को और बढ़ा दिया।

अस्पताल की सह-रोगों वाली दलील खारिज

अस्पताल ने अपने बचाव में कहा था कि रोगी को कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं थीं। इनमें उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय की धमनियों से जुड़ी बीमारी, लंबे समय से चली आ रही गुर्दे की बीमारी, पहले हो चुके मस्तिष्काघात और दाहिनी आंतरिक कैरोटिड धमनी में रुकावट जैसी समस्याएं शामिल थीं।

अस्पताल का तर्क था कि इन्हीं कारणों से रक्त का थक्का घोलने वाली चिकित्सा नहीं की गई। लेकिन आयोग इस दलील से संतुष्ट नहीं हुआ।

आयोग ने कहा कि उस समय तैयार किए गए मूल चिकित्सकीय अभिलेख में यह स्पष्ट रूप से नहीं लिखा था कि इन सह-रोगों के कारण संबंधित उपचार नहीं किया गया। आयोग के अनुसार, अस्पताल की ओर से दी गई यह वजह बाद में सामने आई, जब उपचार में देरी का आरोप लगाया गया। इसी कारण आयोग ने अस्पताल की इस दलील को बाद में तैयार किया गया बचाव बताया।

चिकित्सकीय अभिलेखों को लेकर भी कड़ी टिप्पणी

आयोग ने केवल उपचार में देरी पर ही अस्पताल को जिम्मेदार नहीं ठहराया, बल्कि चिकित्सकीय अभिलेखों के रखरखाव पर भी गंभीर टिप्पणी की। आयोग ने पाया कि रोगी के कुछ महत्वपूर्ण परीक्षणों से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए थे। इनमें मस्तिष्क की जांच से संबंधित परिकलित टोमोग्राफी परीक्षण और रक्त के जमने की स्थिति से जुड़ी जांच की रिपोर्ट शामिल थीं।

इसके अलावा 28 मार्च से 17 अक्टूबर 2013 के बीच की लंबी अवधि से संबंधित पर्याप्त चिकित्सकीय अभिलेख भी आयोग के सामने उपलब्ध नहीं थे। आयोग ने अभिलेखों के इस तरह अधूरे और खराब तरीके से रखे जाने के लिए अलग से एक लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया।

परिवार को 43.36 लाख रुपये का मुआवजा

आयोग ने मृतक के परिवार को होने वाली आर्थिक क्षति का भी आकलन किया। देवेंद्र राव की आय, उनके व्यक्तिगत खर्च में कटौती और लागू गणना गुणक के आधार पर परिवार की आय संबंधी क्षति 40.11 लाख रुपये निर्धारित की गई।

इसके अतिरिक्त संपत्ति की क्षति के लिए एक लाख रुपये दिए गए। मृतक की पत्नी को पति के निधन से हुई पारिवारिक क्षति के लिए 50 हजार रुपये तथा बेटे और बेटी को 25-25 हजार रुपये दिए गए।

चिकित्सकीय अभिलेखों के खराब रखरखाव के लिए एक लाख रुपये और मामले की कार्यवाही पर हुए खर्च के लिए 25 हजार रुपये अलग से दिए गए। इस तरह आयोग द्वारा निर्धारित कुल मुआवजा 43.36 लाख रुपये हो गया।

मामले से क्या संदेश मिलता है?

यह फैसला चिकित्सकीय आपात स्थिति में समय पर उपचार की अहमियत को रेखांकित करता है। मस्तिष्काघात जैसी गंभीर स्थिति में शुरुआती समय उपचार के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे मामलों में उपचार में हुई देरी रोगी की स्थिति पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।

फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि अस्पतालों के लिए केवल उपचार उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। रोगी के अस्पताल पहुंचने का सही समय, चिकित्सकीय जांच, दी गई दवाएं, उपचार के निर्णय और उनके कारणों से संबंधित अभिलेख भी पूरी तरह सही और व्यवस्थित होना जरूरी है।

यदि चिकित्सकीय अभिलेखों में काट-छांट, अस्पष्टता या महत्वपूर्ण समयावधि के दस्तावेज गायब हों, तो इससे अस्पताल की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। उपभोक्ता विवादों में ऐसे अभिलेख मामले की जांच के लिए महत्वपूर्ण प्रमाण बन सकते हैं।

देवेंद्र राव के मामले में आयोग ने उपचार में देरी और अभिलेखों की खराब स्थिति को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल को मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह फैसला उन परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है जो चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में न्याय की मांग करते हैं।

चिकित्सकीय सेवा से संबंधित शिकायत रखने वाले उपभोक्ता अपने राज्य की उपभोक्ता सहायता व्यवस्था से संपर्क कर सकते हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के लिए 1915 पर संपर्क किया जा सकता है। तेलंगाना के लिए उपलब्ध सहायता संख्या 0771-2582902 बताई गई है।

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