भारतीय शेयर बाजार में हाल ही में लागू की गई नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (Closing Auction Session – CAS) व्यवस्था ने दलाल स्ट्रीट में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव पैदा कर दिया है। महज 20 मिनट की इस नई प्रक्रिया ने निफ्टी 50 और सेंसेक्स के क्लोजिंग स्तरों में असामान्य अंतर पैदा कर दिया, जिससे कई निवेशकों और खासकर डेरिवेटिव ट्रेडर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय शेयर बाजार को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है। हालांकि शुरुआती दिनों में इस नई प्रणाली ने बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है, लेकिन समय के साथ इसके स्थिर होने की उम्मीद जताई जा रही है।
क्या है नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) व्यवस्था?
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने सोमवार से Closing Auction Session (CAS) लागू किया है। यह एक अलग 20 मिनट का ट्रेडिंग सत्र है, जो नियमित कारोबार समाप्त होने के तुरंत बाद दोपहर 3:15 बजे शुरू होता है।
इस दौरान निवेशक और संस्थागत प्रतिभागी खरीद एवं बिक्री के ऑर्डर दर्ज कर सकते हैं। ऑर्डर एंट्री 3:28 से 3:30 बजे के बीच किसी भी समय रैंडम तरीके से बंद होती है। इसके बाद एक्सचेंज सभी ऑर्डर का मिलान करता है और उस कीमत का निर्धारण करता है, जिस पर अधिकतम मात्रा में शेयरों की खरीद-बिक्री संभव हो सके। यही कीमत संबंधित शेयर का क्लोजिंग प्राइस बन जाती है।
पहले क्लोजिंग प्राइस का निर्धारण नियमित ट्रेडिंग के अंतिम 30 मिनट के औसत मूल्य के आधार पर किया जाता था। हालांकि यह नई व्यवस्था फिलहाल केवल उन शेयरों पर लागू की गई है जिनमें फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) ट्रेडिंग उपलब्ध है। अन्य शेयरों में पुरानी प्रणाली ही लागू रहेगी।
निफ्टी और सेंसेक्स में क्यों आया अंतर?
नई व्यवस्था लागू होने के बाद लगातार तीन कारोबारी सत्रों तक निफ्टी 50 और बीएसई सेंसेक्स के क्लोजिंग स्तरों में असामान्य अंतर देखने को मिला।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि एनएसई (NSE) और बीएसई (BSE) दोनों के ऑर्डर बुक अलग-अलग होते हैं। यानी किसी शेयर की अंतिम कीमत दोनों एक्सचेंजों पर अलग हो सकती है।
हालांकि सेंसेक्स के सभी 30 शेयर निफ्टी 50 का भी हिस्सा हैं, लेकिन दोनों इंडेक्स में प्रत्येक शेयर का वेटेज अलग-अलग होता है। इसके अलावा नकद बाजार (Cash Market) में एनएसई पर बीएसई की तुलना में कहीं अधिक संस्थागत कारोबार होता है, जिससे क्लोजिंग प्राइस में अंतर और अधिक बढ़ सकता है।
नई प्रणाली में ट्रेडर्स को अंतिम 20 मिनट के दौरान पहले की तरह खरीद और बिक्री की लाइव बोली (Bid-Ask Prices) की पूरी जानकारी भी उपलब्ध नहीं रहती। इससे बाजार की दिशा का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।
दलाल स्ट्रीट पर क्यों मची हलचल?
नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था का सबसे बड़ा असर मंगलवार को देखने को मिला। उसी दिन निफ्टी के साप्ताहिक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी भी थी।
जैसे ही अंतिम क्लोजिंग प्राइस तय हुई, निफ्टी 50 में अचानक तेज उछाल आया। इसका सीधा असर ऑप्शंस प्रीमियम पर पड़ा और कई कॉन्ट्रैक्ट्स की कीमतों में कुछ ही मिनटों में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
कई रिटेल ट्रेडर्स ने शिकायत की कि उन्हें अंतिम क्लोजिंग स्तर का अनुमान लगाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। परिणामस्वरूप अनेक ट्रेडर्स को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
नई प्रणाली लागू करने का उद्देश्य क्या है?
एक्सचेंजों के अनुसार, क्लोजिंग ऑक्शन सेशन का मुख्य उद्देश्य शेयरों के क्लोजिंग प्राइस को अधिक निष्पक्ष (Fair) और पारदर्शी (Transparent) बनाना है।
बड़े संस्थागत निवेशकों द्वारा किए जाने वाले भारी खरीद-बिक्री ऑर्डर को बेहतर तरीके से निष्पादित करने के लिए भी इस प्रणाली को अपनाया गया है।
दुनिया के कई विकसित शेयर बाजारों में इसी प्रकार की क्लोजिंग ऑक्शन प्रणाली पहले से लागू है। भारत ने भी अपने बाजार को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के लिए यह बदलाव किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में यह व्यवस्था बाजार की दक्षता बढ़ा सकती है और क्लोजिंग प्राइस में कृत्रिम उतार-चढ़ाव को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।
किसे हुआ फायदा और किसे नुकसान?
नई प्रणाली से सबसे अधिक लाभ आर्बिट्राज फंड्स (Arbitrage Funds) को हुआ।
ये फंड नकद बाजार और फ्यूचर्स बाजार दोनों में एक साथ पोजीशन लेते हैं। जब कैश मार्केट की कीमतें तेजी से बढ़ीं और फ्यूचर्स की कीमतें अपेक्षाकृत पीछे रह गईं, तब इनके लिए शानदार आर्बिट्राज अवसर पैदा हो गए।
दूसरी ओर, बड़ी संख्या में रिटेल निवेशक और ऑप्शन ट्रेडर्स इस बदलाव के लिए तैयार नहीं थे। अचानक हुए मूल्य परिवर्तन के कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।
विशेष रूप से वे ट्रेडर्स प्रभावित हुए जिन्होंने अंतिम समय तक बाजार की दिशा पर आधारित ट्रेडिंग रणनीति बनाई थी।
क्या आगे भी रहेगा निफ्टी-सेंसेक्स में अंतर?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति स्थायी नहीं रहेगी।
जैसे-जैसे अधिक ट्रेडर्स, संस्थागत निवेशक और एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग सिस्टम नई प्रक्रिया के अनुरूप अपनी रणनीतियां बदलेंगे, वैसे-वैसे निफ्टी और सेंसेक्स के क्लोजिंग स्तरों में दिखाई देने वाला अंतर कम होने लगेगा।
कोटक म्यूचुअल फंड ने भी अपने निवेशकों के लिए जारी नोट में कहा है कि शुरुआती दिनों में मूल्य निर्धारण में अस्थायी असमानता और अस्थिरता देखने को मिल सकती है, लेकिन समय के साथ बाजार नई प्रणाली के अनुसार स्वयं को संतुलित कर लेगा।
क्या नियामक करेगा नियमों में बदलाव?
बाजार से जुड़े सूत्रों के अनुसार फिलहाल नियामक संस्थाएं इस नई प्रणाली की तुरंत समीक्षा करने के पक्ष में नहीं हैं।
उनका मानना है कि शुरुआती तकनीकी और व्यवहारिक चुनौतियां धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगी और बाजार प्रतिभागी नई व्यवस्था के अनुरूप अपने ट्रेडिंग पैटर्न विकसित कर लेंगे।
यदि भविष्य में भी अत्यधिक अस्थिरता बनी रहती है, तभी नियमों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है सीख?
नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शेयर बाजार लगातार विकसित हो रहा है और नई प्रणालियों के अनुसार निवेशकों को भी अपनी रणनीतियां बदलनी होंगी।
विशेषज्ञों की सलाह है कि रिटेल निवेशकों को अंतिम समय की ट्रेडिंग पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय जोखिम प्रबंधन (Risk Management), उचित स्टॉप लॉस और दीर्घकालिक निवेश रणनीति अपनानी चाहिए।
आने वाले समय में जैसे-जैसे बाजार इस नई व्यवस्था को स्वीकार करेगा, क्लोजिंग प्राइस में स्थिरता आने की संभावना बढ़ेगी। तब तक निवेशकों को सतर्क रहकर बाजार की नई प्रणाली को समझना और उसके अनुरूप निवेश निर्णय लेना अधिक लाभदायक साबित हो सकता है।


