अमिताभ बच्चन द्वारा प्रस्तुत लोकप्रिय ज्ञान आधारित कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति के अठारहवें संस्करण में राजस्थान के शांपुरा निवासी कृष्ण कुमावत ने अपनी मेहनत, संघर्ष और ज्ञान से दर्शकों का दिल जीत लिया। पेशे से टाइल लगाने का काम करने वाले कृष्ण रोजाना करीब ८०० रुपये कमाते हैं। उन्होंने कार्यक्रम में शानदार प्रदर्शन करते हुए ५० लाख रुपये की धनराशि अपने नाम की, लेकिन एक करोड़ रुपये के सवाल पर निश्चित उत्तर नहीं होने के कारण उन्होंने आगे खेलने का जोखिम नहीं उठाया और खेल छोड़ने का फैसला किया।
कृष्ण कुमावत १ सितंबर के प्रसारण में अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए निर्णायक चरण तक पहुंचे। इससे पहले वह ३१ अगस्त के प्रसारण में भी दिखाई दिए थे और अगले चरण के लिए सुरक्षित प्रतिभागी के रूप में लौटे थे।
कृष्ण की कहानी केवल एक खेल प्रतियोगिता में बड़ी धनराशि जीतने की कहानी नहीं है। यह सीमित आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद सीखने की इच्छा और आगे बढ़ने के संकल्प की कहानी भी है।
परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण बारहवीं के बाद पढ़ाई छूटी
कृष्ण ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वह अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं और कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गई थीं। इसी कारण बारहवीं कक्षा के बाद उन्हें औपचारिक पढ़ाई छोड़कर काम शुरू करना पड़ा।
उनके पिता भी टाइल लगाने का काम करते थे। परिवार की परिस्थितियों को देखते हुए कृष्ण ने भी यही काम अपना लिया। पिछले करीब १० से १५ वर्षों से वह घरों में फर्श, रसोई और स्नानघर में टाइल लगाने का काम करते आ रहे हैं।
हालांकि पढ़ाई औपचारिक रूप से रुक गई, लेकिन सीखने की उनकी इच्छा कभी खत्म नहीं हुई। कृष्ण ने बताया कि वह दिनभर काम करने के बाद रात में खाना खाकर पढ़ाई करते हैं। उनके लिए शिक्षा केवल विद्यालय जाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपने स्तर पर लगातार ज्ञान हासिल करने की कोशिश जारी रखी।
पहली बार मुंबई और पहली हवाई यात्रा
कौन बनेगा करोड़पति में पहुंचना कृष्ण के जीवन में कई नए अनुभव लेकर आया। यह उनकी मुंबई की पहली यात्रा थी। इसके साथ ही उन्होंने पहली बार हवाई जहाज में सफर किया।
एक छोटे शहर और साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले कृष्ण के लिए यह अनुभव अपने आप में बेहद खास था। कार्यक्रम के दौरान उनके संघर्ष और आत्मविश्वास की कहानी ने दर्शकों को प्रभावित किया।
अमिताभ बच्चन के साथ बातचीत के दौरान कृष्ण ने अपने पेशे से जुड़े अनुभवों को भी खुलकर साझा किया।
टाइल मजदूरों के साथ होने वाले भेदभाव का दर्द
कृष्ण ने बताया कि घरों में टाइल लगाने वाले मजदूरों को कई बार सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनका कहना था कि कुछ घरों में उन्हें अंदर बैठकर खाना खाने की अनुमति नहीं दी जाती। यहां तक कि पानी मांगने पर भी उन्हें अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा है।
कृष्ण ने बताया कि वह और उनके जैसे मजदूर लोगों के घरों को सुंदर बनाने के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन कुछ स्थानों पर उन्हें सम्मान नहीं मिलता। उन्होंने निर्माण स्थलों पर काम करने वाले अभियंताओं और अन्य पढ़े-लिखे लोगों के साथ होने वाले व्यवहार का उदाहरण देते हुए कहा कि शिक्षा और डिग्री के कारण उन्हें अलग सम्मान मिलता है।
उनकी बातों से यह संदेश भी सामने आया कि किसी व्यक्ति के काम की प्रकृति उसके सम्मान का आधार नहीं होनी चाहिए। हर मेहनत करने वाले व्यक्ति को समान सम्मान मिलना चाहिए।
रोजाना ८०० रुपये कमाने वाले कृष्ण ने जीते ५० लाख
कृष्ण ने कार्यक्रम में बताया कि उनकी रोजाना की आमदनी करीब ८०० रुपये है। उनकी मासिक आमदनी लगभग २० हजार से २५ हजार रुपये के बीच रहती है। कार्यक्रम में आने के समय उनके बैंक खाते में करीब २,५०० रुपये ही जमा थे।
ऐसे में ५० लाख रुपये की धनराशि जीतना उनके और उनके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कृष्ण ने बताया कि उनका घर बरसात के दौरान टपकता है और वह पुरस्कार की धनराशि से अपने घर की मरम्मत करवाना चाहते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्षों तक दूसरे लोगों के घरों में टाइल लगाने के बाद अब वह अपने घर में भी टाइल लगवाना चाहते हैं। इसके अलावा वह अपनी पत्नी के लिए मंगलसूत्र खरीदने की इच्छा रखते हैं।
बच्चों की शिक्षा कृष्ण का सबसे बड़ा सपना
कृष्ण अपने बच्चों के भविष्य को लेकर भी बेहद गंभीर हैं। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि उनके बच्चों को वही कठिन मेहनत करनी पड़े जो उन्होंने अपने जीवन में की है।
उनका सपना है कि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और वे आगे चलकर अच्छे अभियंता बनें। कृष्ण की यह इच्छा उनकी अपनी अधूरी औपचारिक शिक्षा से भी जुड़ी हुई दिखाई देती है।
वह अपने बच्चों को वह अवसर देना चाहते हैं जो आर्थिक परिस्थितियों के कारण उन्हें स्वयं नहीं मिल पाया।
कृष्ण ११ सदस्यों वाले परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य हैं। उनके एक छोटे भाई मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते हैं, जबकि दूसरे भाई उनके साथ टाइल लगाने के काम में हाथ बंटाते हैं। इसके बावजूद परिवार की सबसे बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी कृष्ण के कंधों पर है।
कठिन सवालों का आत्मविश्वास से सामना
कृष्ण ने कार्यक्रम में लगातार सही उत्तर देकर बड़ी धनराशि तक पहुंच बनाई। २५ हजार रुपये की शुरुआती महत्वपूर्ण सीमा पार करने के बाद उन्हें ऐसा सवाल भी मिला जिसमें उत्तर के विकल्प उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने उस सवाल का सही उत्तर देकर आगे की विशेष सहायता प्राप्त की।
इसके बाद दो लाख रुपये के सवाल पर उन्होंने दर्शकों की राय वाली सहायता का इस्तेमाल किया। पांच लाख रुपये के सवाल पर उन्होंने संकेत वाली सहायता का सहारा लिया और फिर अतिरिक्त सहायता का भी उपयोग किया।
इसके बाद विशेष धन-संदूक चरण में उन्होंने आठ सवालों के सही उत्तर दिए और ८० हजार रुपये अर्जित किए। हालांकि उन्होंने उस धनराशि को अपनी कुल जीत में जोड़ने के बजाय आधा-आधा विकल्प वाली सहायता को सुरक्षित रखने का निर्णय लिया।
यह फैसला आगे चलकर उनके लिए उपयोगी साबित हुआ। १२वें सवाल, जिसकी कीमत १२ लाख ५० हजार रुपये थी, पर उन्होंने इसी सहायता का इस्तेमाल किया और सही उत्तर दिया।
इसके बाद उन्होंने २५ लाख और ५० लाख रुपये वाले सवालों का भी सही उत्तर दिया। इन दोनों चरणों में उन्हें किसी सहायता की जरूरत नहीं पड़ी।
एक करोड़ रुपये का सवाल बना अंतिम पड़ाव
आखिरकार कृष्ण के सामने एक करोड़ रुपये का सवाल आया। सवाल था कि अमेरिका के भविष्य में राष्ट्रपति बनने वाले किस व्यक्ति ने सांसद रहते हुए पाइथागोरस प्रमेय का मौलिक प्रमाण प्रकाशित किया था?
इसके चार विकल्प दिए गए थे—जैकरी टेलर, जेम्स बुकानन, रदरफोर्ड बी. हेज और जेम्स ए. गारफील्ड।
सही उत्तर जेम्स ए. गारफील्ड था। हालांकि कृष्ण इस सवाल के उत्तर को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। उनके पास पहले से ५० लाख रुपये की सुरक्षित धनराशि थी। इसलिए उन्होंने जोखिम लेने के बजाय खेल छोड़ने का फैसला किया और ५० लाख रुपये लेकर घर लौटे।
जेम्स गारफील्ड ने कैसे सिद्ध किया था प्रमेय?
जेम्स ए. गारफील्ड बाद में अमेरिका के बीसवें राष्ट्रपति बने। उन्होंने सांसद के रूप में कार्य करते हुए पाइथागोरस प्रमेय का एक मौलिक प्रमाण तैयार किया था।
उनका प्रमाण दो समान समकोण त्रिभुजों की सहायता से बनाया गया था। इन त्रिभुजों को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया कि एक समलंब आकृति बन गई। इसके बाद उन्होंने उस आकृति का क्षेत्रफल दो अलग-अलग तरीकों से निकाला।
दोनों तरीकों से प्राप्त क्षेत्रफलों को बराबर रखने पर उन्हें वह संबंध प्राप्त हुआ जिसके अनुसार समकोण त्रिभुज में कर्ण के वर्ग का मान बाकी दोनों भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है।
गारफील्ड का यह प्रमाण वर्ष १८७६ में प्रकाशित हुआ था, जबकि वह अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से लगभग पांच वर्ष पहले की बात है।
संघर्ष से मिली बड़ी जीत
कृष्ण कुमावत की कहानी इस बात का उदाहरण है कि आर्थिक कठिनाइयां किसी व्यक्ति की सीखने की इच्छा को हमेशा रोक नहीं सकतीं। दिनभर मेहनत करके परिवार का भरण-पोषण करने के बाद रात में पढ़ाई करना और फिर ज्ञान आधारित कार्यक्रम में पहुंचकर ५० लाख रुपये जीतना उनकी मेहनत और लगन को दर्शाता है।
एक करोड़ रुपये का सवाल भले ही उनके लिए अंतिम पड़ाव साबित हुआ, लेकिन ५० लाख रुपये की जीत उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। घर की मरम्मत, परिवार की जरूरतें, पत्नी के लिए उपहार और बच्चों की शिक्षा जैसे उनके सपनों को अब नई उम्मीद मिली है।
कृष्ण ने करोड़पति बनने का मौका जरूर छोड़ा, लेकिन उनकी कहानी ने यह साबित कर दिया कि सीखने की इच्छा और आत्मविश्वास किसी भी आर्थिक परिस्थिति से बड़ा हो सकता है।


