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सचिन तेंदुलकर के साथ सम्मान पाने वाले बल्लेबाज की अनसुनी कहानी

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ ऐसे खिलाड़ी भी रहे हैं, जिनके आंकड़े उनकी प्रतिभा की गवाही देते हैं, लेकिन जिन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी क्षमता साबित करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिल सके। अभिजीत काले की कहानी भी ऐसी ही एक असाधारण और उतार-चढ़ाव से भरी कहानी है। मुंबई के उस दौर में जब क्रिकेट प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं थी, काले ने बचपन से ही अपनी बल्लेबाजी का ऐसा प्रभाव छोड़ा था कि उन्हें महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के साथ मुंबई के सर्वश्रेष्ठ कनिष्ठ क्रिकेटर का सम्मान साझा करने का अवसर मिला।

वर्ष 1987-88 में काले और तेंदुलकर को मुंबई के सर्वश्रेष्ठ कनिष्ठ क्रिकेटर के सम्मान के लिए संयुक्त रूप से चुना गया था। उस समय दोनों ही युवा प्रतिभाएं थीं और किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले वर्षों में उनके क्रिकेट जीवन की दिशा कितनी अलग हो जाएगी। उसी दौर में विनोद कांबली, जतिन परांजपे और कई अन्य प्रतिभाशाली खिलाड़ी भी मुंबई की कनिष्ठ क्रिकेट व्यवस्था में अपनी पहचान बना रहे थे।

तेंदुलकर और काले की मुलाकात प्रतिनिधि क्रिकेट में भी हुई। तेंदुलकर की कप्तानी वाली मुंबई की अंडर-17 टीम में काले के साथ विनोद कांबली और जतिन परांजपे जैसे खिलाड़ी भी शामिल थे। यह वह पीढ़ी थी जिसने मुंबई की क्रिकेट व्यवस्था को असाधारण प्रतिभाओं से भर दिया था। तेंदुलकर और कांबली आगे चलकर भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित नाम बने, जबकि काले का नाम धीरे-धीरे घरेलू क्रिकेट की सीमाओं में सिमट गया।

मुंबई की मजबूत वरिष्ठ टीम में जगह बनाना काले के लिए आसान नहीं था। लगातार अच्छी प्रतिभाओं के सामने अवसर सीमित थे। यही कारण रहा कि उन्होंने महाराष्ट्र का रुख किया। वहां उन्हें अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिले और उन्होंने अपने बल्ले से इसका पूरा लाभ उठाया।

काले ने घरेलू क्रिकेट में लंबे समय तक निरंतर प्रदर्शन किया। उन्होंने 93 प्रथम श्रेणी मुकाबलों में कुल 7,134 रन बनाए और उनका बल्लेबाजी औसत 54.45 रहा। उनके नाम 25 शतक और 28 अर्धशतक दर्ज हैं। उनका सर्वोच्च स्कोर नाबाद 248 रन रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि वह केवल कुछ अच्छी पारियां खेलने वाले बल्लेबाज नहीं थे, बल्कि लंबे समय तक लगातार रन बनाने की क्षमता रखने वाले खिलाड़ी थे।

वर्ष 1999-2000 में बड़ौदा के खिलाफ खेली गई उनकी नाबाद 248 रन की पारी उनके घरेलू जीवन की सबसे उल्लेखनीय पारियों में से एक रही। महाराष्ट्र की टीम संकट में थी और उसे दोबारा बल्लेबाजी के लिए उतरना पड़ा था। ऐसे कठिन समय में काले ने एक छोर संभाले रखा और विशाल पारी खेलकर अपनी टीम को संकट से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह पारी उनके धैर्य, तकनीक और कठिन परिस्थितियों में बल्लेबाजी करने की क्षमता का प्रमाण बनी।

काले की प्रतिभा केवल लंबे प्रारूप तक सीमित नहीं थी। वर्ष 1994-95 में उन्होंने बड़ौदा के खिलाफ महज 16 गेंदों में अर्धशतक पूरा किया था। उस समय यह भारतीय बल्लेबाजों के बीच सबसे तेज एकदिवसीय घरेलू अर्धशतकों में शामिल था। इससे पता चलता है कि आवश्यकता पड़ने पर काले तेज गति से भी रन बनाने में सक्षम थे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के खिलाफ भी उन्होंने अपनी क्षमता दिखाई। इंग्लैंड के खिलाफ जयपुर में नवंबर 2001 में भारत की ‘ए’ टीम मुश्किल स्थिति में पहुंच गई थी। टीम ने केवल आठ रन पर चार विकेट गंवा दिए थे। इंग्लैंड के तेज गेंदबाज रिचर्ड जॉनसन और एंड्रयू फ्लिंटॉफ शुरुआती झटके दे चुके थे। ऐसे समय में काले ने 122 रन की शानदार पारी खेली और भारत की ‘ए’ टीम को 233 रन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जिम्बाब्वे के खिलाफ बोर्ड अध्यक्ष एकादश की ओर से उन्होंने 90 रन बनाए। दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर भारत की ‘ए’ टीम के लिए खेलते हुए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका ‘ए’ के खिलाफ 75 रन की पारी भी खेली। इन प्रदर्शनों के बाद यह धारणा मजबूत हुई कि काले राष्ट्रीय टीम के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।

पूर्व भारतीय चयनकर्ता अशोक मल्होत्रा ने भी काले को तकनीकी रूप से मजबूत बल्लेबाज बताया था और माना था कि उनकी बल्लेबाजी विशेष रूप से लंबे प्रारूप के लिए उपयुक्त थी। घरेलू क्रिकेट में लगातार रन, विदेशी परिस्थितियों में प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय स्तर के गेंदबाजों के खिलाफ सफल पारियां उनके पक्ष में मजबूत तर्क पेश कर रही थीं।

लेकिन जब भारतीय टीम में उन्हें जगह मिली, तो अवसर एकदिवसीय क्रिकेट में आया। अप्रैल 2003 में ढाका में बांग्लादेश के खिलाफ काले ने भारत के लिए पदार्पण किया। उस समय उनकी उम्र 29 वर्ष और 287 दिन थी। कई वरिष्ठ खिलाड़ियों की अनुपस्थिति के कारण टीम में नए खिलाड़ियों के लिए अवसर बना था।

काले ने अपने पहले और अंतिम अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में 22 गेंदों पर केवल 10 रन बनाए। इसके बाद उन्हें दोबारा भारतीय टीम में जगह नहीं मिली। इस प्रकार 7,134 प्रथम श्रेणी रन बनाने वाले इस बल्लेबाज का अंतरराष्ट्रीय जीवन केवल एक मुकाबले तक सीमित रह गया। उनके नाम एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मुकाबला, 10 रन और उसके बाद कोई दूसरा अवसर नहीं रहा।

काले की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई, बल्कि इसके बाद उनके क्रिकेट जीवन ने एक बेहद विवादास्पद मोड़ लिया।

वर्ष 2003 में भारतीय चयनकर्ताओं किरण मोरे और प्रणब रॉय ने आरोप लगाया कि काले ने भारतीय टीम में चयन से जुड़े मामले में उन्हें 10-10 लाख रुपये देने की पेशकश की थी। काले ने धन देने की पेशकश करने से इनकार किया। बाद में भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड की कार्यवाही के दौरान उन्होंने यह स्वीकार किया कि उन्होंने चयनकर्ताओं को प्रभावित करने का प्रयास किया था और उनसे सीधे अथवा अपने माता-पिता के माध्यम से संपर्क किया था।

काले ने इस व्यवहार के लिए माफी मांगी। उन्होंने धन देने के आरोप के संबंध में कहा कि उन्हें गलत समझा गया था और उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था। भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड ने उन्हें अनुशासनहीनता और अनुचित आचरण का दोषी माना तथा वर्ष 2004 के अंत तक प्रतिबंधित कर दिया।

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि धन की कथित पेशकश को लेकर प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया था। तत्कालीन बोर्ड अध्यक्ष जगमोहन डालमिया ने भी उस समय माना था कि धन की पेशकश का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं था। इसलिए काले के खिलाफ की गई कार्रवाई मुख्य रूप से उस अनुचित व्यवहार पर आधारित थी, जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था।

इस विवाद ने उनके क्रिकेट जीवन की गति को बुरी तरह प्रभावित किया। जिस समय वह घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे और भारतीय टीम के लिए अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे, उसी समय विवाद और प्रतिबंध ने उनके आगे बढ़ने की संभावनाओं को लगभग समाप्त कर दिया।

काले की कहानी इसलिए भी असाधारण है क्योंकि उनके शुरुआती क्रिकेट जीवन में उन्हें सचिन तेंदुलकर के बराबर आंका गया था। दोनों ने मुंबई के सर्वश्रेष्ठ कनिष्ठ क्रिकेटर का सम्मान साझा किया था। दोनों ने प्रतिनिधि क्रिकेट में साथ खेला था। लेकिन जहां तेंदुलकर भारतीय क्रिकेट के सबसे महान खिलाड़ियों में शामिल हुए और 664 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले, वहीं काले का अंतरराष्ट्रीय जीवन केवल एक मुकाबले तक सीमित रह गया।

घरेलू क्रिकेट के आंकड़े आज भी काले की क्षमता की गवाही देते हैं। 93 प्रथम श्रेणी मुकाबले, 7,134 रन, 54.45 का औसत, 25 शतक, 28 अर्धशतक और नाबाद 248 रन किसी साधारण बल्लेबाज के आंकड़े नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें भारत की ओर से लंबे समय तक खेलने का अवसर नहीं मिला।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि क्रिकेट में केवल प्रतिभा और रन ही पर्याप्त नहीं होते। सही समय पर अवसर मिलना, चयन की परिस्थितियां, टीम में प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव और मैदान के बाहर की घटनाएं किसी खिलाड़ी के पूरे जीवन को बदल सकती हैं।

अभिजीत काले उस पीढ़ी के उन प्रतिभाशाली बल्लेबाजों में रहे, जिनका घरेलू प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर की पहचान के अनुरूप था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर उन्हें अपनी क्षमता दिखाने का लगभग कोई अवसर नहीं मिला। सचिन तेंदुलकर के साथ कनिष्ठ स्तर पर सम्मान साझा करने से लेकर 7,000 से अधिक प्रथम श्रेणी रन बनाने और फिर केवल एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबला खेलने तक की उनकी यात्रा भारतीय घरेलू क्रिकेट के इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है।

काले का नाम शायद तेंदुलकर या कांबली जितना लोकप्रिय नहीं हुआ, लेकिन उनके आंकड़े यह सवाल आज भी खड़ा करते हैं कि अगर उन्हें सही समय पर अधिक अवसर मिलते और उनका करियर विवाद की चपेट में नहीं आता, तो भारतीय क्रिकेट का इतिहास उनके लिए कितना अलग हो सकता था।

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