भारत अब अर्धचालक निर्माण के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। मोबाइल फोन, वाहन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां, दूरसंचार उपकरण, कंप्यूटर और औद्योगिक मशीनों से लेकर आधुनिक रक्षा प्रणालियों तक, लगभग हर महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था में अर्धचालक की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक भारत को अपनी जरूरत के लिए बड़ी मात्रा में अर्धचालक का आयात करना पड़ता रहा है। अब सरकार की नीतियों और बड़े औद्योगिक निवेश के कारण देश में चिप निर्माण से लेकर उनकी पैकेजिंग और जांच तक का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा रहा है।
केंद्र सरकार के अर्धचालक विकास कार्यक्रम के तहत देश में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, फरवरी 2026 तक एक अर्धचालक निर्माण कारखाने, आठ संयोजन, परीक्षण, अंकन और पैकेजिंग इकाइयों तथा एक मिश्रित अर्धचालक कारखाने के लिए परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी थी।
इन परियोजनाओं में गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनके अलावा पंजाब और आंध्र प्रदेश में भी अर्धचालक तथा संबंधित इलेक्ट्रॉनिक घटक निर्माण क्षमता विकसित की जा रही है। सरकार का व्यापक लक्ष्य देश में ऐसी आपूर्ति श्रृंखला तैयार करना है, जिसमें चिप की अभिकल्पना से लेकर उसके निर्माण, परीक्षण, पैकेजिंग और अंतिम उपयोग तक अधिक से अधिक गतिविधियां भारत में हो सकें।
अर्धचालक संयंत्र भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
अर्धचालक आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। आज के स्मार्टफोन, कार, उपग्रह, दूरसंचार उपकरण, चिकित्सा यंत्र, कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियां इनके बिना संचालित नहीं हो सकतीं। इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा प्रबंधन प्रणालियों में भी इनका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का निर्माण तेजी से बढ़ने के बावजूद चिप और कई महत्वपूर्ण अर्धचालक घटकों के लिए देश लंबे समय से आयात पर निर्भर रहा है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से न केवल आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, बल्कि आपूर्ति में आने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यवधानों से भी भारतीय उद्योग को सुरक्षा मिल सकती है।
सरकार ने वर्ष 2021 में 76,000 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ अर्धचालक और प्रदर्शन निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने का व्यापक कार्यक्रम शुरू किया था। इस योजना में सिलिकॉन आधारित अर्धचालक कारखानों, मिश्रित अर्धचालकों और पैकेजिंग जैसी क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है।
भारत के आठ प्रमुख अर्धचालक संयंत्र
- माइक्रोन का संयंत्र, गुजरात
गुजरात के साणंद में माइक्रोन का संयंत्र भारत की प्रमुख अर्धचालक परियोजनाओं में शामिल है। लगभग 22,516 करोड़ रुपये के निवेश वाली इस परियोजना में स्मृति अर्धचालकों के संयोजन, परीक्षण, अंकन और पैकेजिंग पर ध्यान दिया जा रहा है।
यहां मुख्य रूप से गतिशील यादृच्छिक अभिगम स्मृति और फ्लैश स्मृति से संबंधित उत्पादों का संयोजन तथा परीक्षण किया जाना है। ऐसे अर्धचालक मोबाइल उपकरणों, कंप्यूटरों, आंकड़ा केंद्रों और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में उपयोग होते हैं।
इस परियोजना का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इससे भारत में अर्धचालक निर्माण की शुरुआती औद्योगिक क्षमता मजबूत हो रही है। इससे घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति का आधार मिल सकता है।
- टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और पीएसएमसी का अर्धचालक कारखाना, गुजरात
गुजरात के धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पीएसएमसी की साझेदारी से एक बड़ा अर्धचालक निर्माण कारखाना स्थापित किया जा रहा है। इस परियोजना में लगभग 91,526 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है।
यह परियोजना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सीधे अर्धचालक पट्टिकाओं के निर्माण की क्षमता विकसित की जाएगी। इनसे आगे विभिन्न प्रकार के चिप तैयार किए जा सकते हैं।
प्रस्तावित संयंत्र में हर महीने लगभग 50,000 अर्धचालक पट्टिकाओं के निर्माण की क्षमता विकसित करने की योजना है। यहां बनने वाले चिप का उपयोग वाहन, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार क्षेत्रों में किया जा सकता है।
- टाटा की अर्धचालक संयोजन और परीक्षण इकाई, असम
असम के मोरीगांव में टाटा की अर्धचालक संयोजन और परीक्षण इकाई पूर्वोत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी निवेश परियोजनाओं में से एक है। इसमें लगभग 27,120 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है।
इस इकाई में उन्नत पैकेजिंग और परीक्षण तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। प्रस्तावित उत्पादन क्षमता लगभग 4.8 करोड़ इकाइयों प्रतिदिन बताई गई है।
यह परियोजना केवल अर्धचालक उद्योग के लिए ही नहीं, बल्कि असम और पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में औद्योगिक विकास तथा रोजगार के अवसरों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
- सीजी पावर, रेनेसास और स्टार्स की इकाई, गुजरात
गुजरात में सीजी पावर ने जापान की रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स और थाईलैंड की स्टार्स माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स के साथ मिलकर अर्धचालक पैकेजिंग और परीक्षण से जुड़ी इकाई स्थापित करने की योजना बनाई है।
इस परियोजना में लगभग 7,584 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। यहां तैयार होने वाले अर्धचालकों का इस्तेमाल वाहन, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक उपकरणों में किया जा सकता है।
प्रस्तावित इकाई की उत्पादन क्षमता लगभग 1.5 करोड़ से अधिक इकाइयां प्रतिदिन बताई गई है। इससे भारत में वाहन और औद्योगिक क्षेत्र के लिए आवश्यक चिप की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
- कायन्स सेमिकॉन इकाई, गुजरात
गुजरात के साणंद में कायन्स सेमिकॉन द्वारा लगभग 3,307 करोड़ रुपये के निवेश से अर्धचालक पैकेजिंग इकाई विकसित की जा रही है।
इस संयंत्र में तार-आधारित संपर्क तकनीक और आधार-पट्ट आधारित पैकेज तैयार किए जाएंगे। ये पैकेज विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले अर्धचालकों को सुरक्षित रखने और उन्हें अंतिम उपकरणों में उपयोग योग्य बनाने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
इस इकाई से प्रतिदिन 63 लाख से अधिक अर्धचालक तैयार करने की क्षमता विकसित होने की उम्मीद है। इससे गुजरात में विकसित हो रहे अर्धचालक औद्योगिक क्षेत्र को और मजबूती मिल सकती है।
- एचसीएल और फॉक्सकॉन की इकाई, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के जेवर क्षेत्र में एचसीएल समूह और फॉक्सकॉन की साझेदारी से लगभग 3,706 करोड़ रुपये की अर्धचालक परियोजना विकसित की जा रही है।
इस इकाई का मुख्य ध्यान प्रदर्शन चालक एकीकृत परिपथों के निर्माण और उनकी पैकेजिंग पर रहेगा। ऐसे चिप टेलीविजन, स्मार्टफोन, कंप्यूटर और अन्य प्रदर्शन आधारित इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रस्तावित उत्पादन क्षमता लगभग 3.6 करोड़ चिप प्रतिमाह बताई गई है। जेवर में इस तरह की परियोजना स्थापित होने से उत्तर भारत में अर्धचालक और इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण का नया औद्योगिक केंद्र विकसित होने की संभावना है।
- सिक्ससेम का सिलिकॉन कार्बाइड संयंत्र, ओडिशा
ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सिक्ससेम द्वारा सिलिकॉन कार्बाइड आधारित अर्धचालक निर्माण क्षमता विकसित की जा रही है। परियोजना में लगभग 2,067 करोड़ रुपये के निवेश की योजना है।
सिलिकॉन कार्बाइड को विशेष रूप से विद्युत वाहनों, ऊर्जा रूपांतरण, बिजली प्रबंधन और उच्च क्षमता वाले विद्युत उपकरणों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
परियोजना में प्रतिवर्ष लगभग 60,000 सिलिकॉन कार्बाइड पट्टिकाओं के निर्माण तथा बड़ी संख्या में पैकेज तैयार करने की क्षमता विकसित करने की योजना है। इससे भारत को उन्नत विद्युत अर्धचालक के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
- थ्रीडी ग्लास सॉल्यूशंस की उन्नत पैकेजिंग इकाई, ओडिशा
ओडिशा के भुवनेश्वर में थ्रीडी ग्लास सॉल्यूशंस द्वारा उन्नत त्रि-आयामी विषम एकीकरण और कांच आधारित आधार-पट्ट तकनीक पर केंद्रित इकाई विकसित की जा रही है।
इस परियोजना में लगभग 1,943 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। इसके उत्पाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष और प्रकाशिकी जैसे उच्च तकनीकी क्षेत्रों में उपयोग किए जा सकते हैं।
परियोजना में हर महीने हजारों कांच पैनल तैयार करने और बड़ी संख्या में उन्नत पैकेज उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित करने की योजना है। यह परियोजना भारत में अगली पीढ़ी की अर्धचालक पैकेजिंग तकनीक विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पंजाब और आंध्र प्रदेश में भी बढ़ रही गतिविधियां
अर्धचालक क्षेत्र का विकास केवल इन आठ प्रमुख परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। पंजाब में कॉन्टिनेंटल डिवाइस इंडिया ने मोहाली स्थित अपनी उत्पादन क्षमता को विस्तार देने की दिशा में काम किया है। इसका संबंध विशेष रूप से सिलिकॉन कार्बाइड आधारित घटकों से है, जिनका इस्तेमाल विद्युत वाहनों और ऊर्जा प्रबंधन प्रणालियों में किया जा सकता है।
आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में एएसआईपी टेक्नोलॉजीज द्वारा भी संयोजन, परीक्षण और पैकेजिंग से जुड़ी इकाई विकसित की जा रही है। प्रस्तावित परियोजना में 460 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश बताया गया है और यहां उपभोक्ता उपकरणों तथा वाहन क्षेत्र के लिए चिप तैयार किए जाने हैं।
अर्धचालक कार्यक्रम से क्या बदलेगा?
भारत के लिए अर्धचालक उद्योग का विकास केवल चिप निर्माण तक सीमित नहीं है। इसके साथ मशीनरी, रसायन, विशेष सामग्री, पैकेजिंग, परीक्षण, अनुसंधान, डिजाइन और कुशल मानव संसाधन की मांग भी बढ़ेगी।
इससे नए रोजगार पैदा होने के साथ स्थानीय कंपनियों के लिए आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने के अवसर बढ़ सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के घरेलू उत्पादन में स्थानीय सामग्री का हिस्सा बढ़ने से भारत की विनिर्माण क्षमता को भी लाभ मिल सकता है।
सरकार की अर्धचालक नीति का उद्देश्य देश में एक ऐसा व्यापक औद्योगिक ढांचा तैयार करना है, जिसमें डिजाइन से लेकर निर्माण और पैकेजिंग तक की क्षमताएं विकसित हों। मंत्रालय के अनुसार, अर्धचालक निर्माण और संबंधित योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता का उद्देश्य देश में टिकाऊ और मजबूत अर्धचालक तथा प्रदर्शन निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना है।
आगे की राह
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल संयंत्र स्थापित करना नहीं, बल्कि उन्हें समय पर उत्पादन में लाना, उच्च गुणवत्ता बनाए रखना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में प्रतिस्पर्धी बनाना होगी। इसके लिए कुशल इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों, विश्वसनीय बिजली आपूर्ति, शुद्ध जल, विशेष रसायनों और उन्नत उपकरणों की निरंतर उपलब्धता आवश्यक होगी।
फिर भी गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश और ओडिशा में विकसित हो रही परियोजनाएं यह संकेत देती हैं कि भारत अर्धचालक क्षेत्र में केवल उपभोक्ता बाजार बने रहने के बजाय उत्पादन केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि इन परियोजनाओं का निर्धारित समय पर सफल क्रियान्वयन होता है, तो आने वाले वर्षों में भारत की चिप आपूर्ति क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण और तकनीकी आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिल सकता है।


