रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने आधुनिक सैन्य रणनीतियों को पूरी तरह बदल दिया है। इस संघर्ष ने दुनिया को यह दिखाया कि अब केवल टैंक, लड़ाकू विमान और मिसाइलें ही युद्ध की दिशा तय नहीं करतीं, बल्कि ड्रोन तकनीक (Drone Warfare) भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है। युद्ध के शुरुआती वर्षों में ऐसा प्रतीत हुआ कि यूक्रेन ने सस्ते लेकिन अत्यधिक प्रभावी ड्रोन के दम पर रूस की सैन्य ताकत को चुनौती दे दी है। कुछ सौ डॉलर की लागत वाले ड्रोन करोड़ों डॉलर कीमत वाले रूसी टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट कर रहे थे।
हालांकि, समय के साथ युद्ध का स्वरूप बदल गया। रूस ने भी अपनी रणनीति में बड़े बदलाव किए और ड्रोन उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) तथा बड़े पैमाने पर हमलों के जरिए यूक्रेन की बढ़त को काफी हद तक संतुलित कर दिया। आज स्थिति यह है कि दोनों देश लगातार नई तकनीकों और रणनीतियों के साथ एक-दूसरे को मात देने की कोशिश कर रहे हैं।
सस्ते ड्रोन ने बदले युद्ध के समीकरण
युद्ध के शुरुआती चरण में यूक्रेन ने पारंपरिक हथियारों की कमी को नवाचार के जरिए पूरा किया। स्वयंसेवकों, इंजीनियरों और स्टार्टअप कंपनियों ने बाजार में मिलने वाले क्वाडकॉप्टर ड्रोन को संशोधित कर FPV (First-Person View) कामिकाज़े ड्रोन में बदल दिया।
इन ड्रोन की कीमत लगभग 400 से 1,000 डॉलर के बीच थी, लेकिन इनकी मारक क्षमता इतनी प्रभावी थी कि ये लाखों डॉलर के रूसी टैंक, तोप और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट कर देते थे। इससे युद्ध के मैदान में लागत और प्रभाव के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला।
‘बाबा यागा’ ड्रोन बना रूस के लिए चुनौती
यूक्रेन ने केवल छोटे ड्रोन ही नहीं बनाए, बल्कि बड़े और अधिक शक्तिशाली ड्रोन भी विकसित किए। इनमें सबसे चर्चित ‘बाबा यागा’ (Vampire Drone) रहा।
यह ड्रोन लगभग 15 किलोग्राम तक विस्फोटक या अन्य सामान ले जाने में सक्षम है। इसका उपयोग मुख्य रूप से रात के समय किया जाता था। यह दुश्मन की खाइयों पर बम गिराने, बारूदी सुरंगें बिछाने और अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों तक आवश्यक सामग्री पहुंचाने में इस्तेमाल हुआ।
यूक्रेनी अधिकारियों के अनुसार, यह ड्रोन युद्ध के दौरान 10 लाख से अधिक मिशन पूरे कर चुका है, जिससे यह संघर्ष का सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला मानवरहित प्लेटफॉर्म बन गया।
समुद्री ड्रोन ने ब्लैक सी में बदला संतुलन
यूक्रेन की रणनीति केवल जमीन तक सीमित नहीं रही। उसने Sea Baby और MAGURA V5 जैसे नौसैनिक ड्रोन विकसित किए, जिन्होंने काला सागर (Black Sea) में रूस की नौसेना के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी।
इन ड्रोन ने कई रूसी युद्धपोतों को नुकसान पहुंचाया। लगातार हमलों के बाद रूस को अपने कई जहाजों को सेवास्तोपोल से हटाकर नोवोरोस्सिय्स्क स्थानांतरित करना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि बिना बड़े युद्धपोतों के भी आधुनिक ड्रोन समुद्री युद्ध की दिशा बदल सकते हैं।
यूक्रेन ने बढ़ाया बड़े पैमाने पर उत्पादन
2025 तक यूक्रेन ने ड्रोन निर्माण को एक विशाल औद्योगिक अभियान का रूप दे दिया। रिपोर्टों के अनुसार, देश हर वर्ष 40 लाख से अधिक ड्रोन तैयार करने लगा।
इसका उद्देश्य स्पष्ट था—यदि रूस के पास अधिक टैंक और लड़ाकू विमान हैं, तो यूक्रेन उनके मुकाबले लाखों ड्रोन तैयार कर युद्ध का संतुलन बदल सकता है।
रूस ने बदली अपनी रणनीति
शुरुआत में ऐसा माना जा रहा था कि ड्रोन तकनीक की दौड़ में रूस पीछे रह गया है। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी।
रूस ने ईरान में विकसित Shahed-136 ड्रोन को अपने यहां Geran-2 नाम से बड़े पैमाने पर बनाना शुरू किया। लगभग 30 से 50 किलोग्राम विस्फोटक ले जाने वाले ये ड्रोन 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हमला करने में सक्षम हैं।
रूस ने एक साथ दर्जनों नहीं बल्कि सैकड़ों ड्रोन भेजने की रणनीति अपनाई। इससे यूक्रेन की वायु रक्षा प्रणाली पर भारी दबाव पड़ा, क्योंकि हर ड्रोन को रोकना संभव नहीं था।
Lancet ड्रोन और नई युद्ध रणनीति
रूस ने Lancet Loitering Munition और ZALA Reconnaissance Drone का संयुक्त उपयोग शुरू किया।
पहले ZALA ड्रोन लक्ष्य की पहचान करता और उसके बाद Lancet ड्रोन सटीक हमला करता। इस रणनीति से पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को दिए गए हॉवित्जर, रडार सिस्टम, एयर डिफेंस यूनिट और सैन्य वाहनों को निशाना बनाया गया।
साथ ही रूस ने ड्रोन संचालन के लिए विशेष सैन्य इकाइयों का गठन किया और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली को अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों के साथ जोड़ दिया।
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध बना सबसे बड़ा हथियार
अब युद्ध केवल ड्रोन बनाम टैंक नहीं रह गया है, बल्कि ड्रोन बनाम जैमर (Jammer) की लड़ाई बन चुका है।
दोनों देश ऐसी इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं जो GPS सिग्नल बाधित कर सकती हैं, ड्रोन और ऑपरेटर के बीच संचार तोड़ सकती हैं, नेविगेशन सिस्टम को भ्रमित कर सकती हैं और कई बार ड्रोन को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही गिरा सकती हैं।
इस वजह से हर नई तकनीक की उपयोगिता बहुत कम समय तक रहती है। जैसे ही कोई नया ड्रोन विकसित होता है, कुछ ही सप्ताह में उसके खिलाफ नया इलेक्ट्रॉनिक जैमर तैयार कर लिया जाता है।
मिसाइलों की जगह ड्रोन रोधी हथियार
यूक्रेन अब भी Patriot, NASAMS और IRIS-T SLM जैसी आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों का उपयोग करता है। लेकिन लाखों डॉलर कीमत वाली इंटरसेप्टर मिसाइल से कुछ हजार डॉलर के ड्रोन को गिराना आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं माना जाता।
इसी कारण यूक्रेन ने Gepard एंटी-एयरक्राफ्ट गन और विशेष इंटरसेप्टर ड्रोन जैसे JEDI Shahed Hunter, Shvidun और LITAVR का उपयोग बढ़ाया है। इनका उद्देश्य जमीन पर हमला करना नहीं बल्कि दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही नष्ट करना है।
अब असली मुकाबला नवाचार और उत्पादन का
विशेषज्ञों का मानना है कि आज युद्ध का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसके पास बेहतर ड्रोन है, बल्कि यह है कि कौन तेजी से नई तकनीक विकसित कर सकता है, अधिक संख्या में उत्पादन कर सकता है और अपने नुकसान की भरपाई जल्दी कर सकता है।
यूक्रेन अब भी हर वर्ष लाखों ड्रोन बना रहा है, वहीं रूस भी लगातार अपने उत्पादन और हमलों की क्षमता बढ़ा रहा है। दोनों देशों ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में केवल नई तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसे बड़े पैमाने पर लागू करना और विरोधी की रणनीति से तेज़ी से खुद को ढालना ही असली सफलता की कुंजी होगी।
निष्कर्ष
रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ड्रोन अब किसी एक देश का गुप्त हथियार नहीं रहे, बल्कि हर आधुनिक सेना की बुनियादी आवश्यकता बन चुके हैं। भविष्य के युद्धों में जीत उसी पक्ष की होगी जो तकनीकी नवाचार, बड़े पैमाने पर उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता और तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने में सबसे आगे होगा।


