भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से विकसित भारत के निर्माण का विस्तृत खाका प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में उन्होंने आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, अर्धचालक निर्माण, महत्वपूर्ण खनिज, उन्नत प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, निर्यात और व्यापक आर्थिक सुधारों को भारत की विकास यात्रा के प्रमुख आधार के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश को अपनी क्षमताओं को तेजी से मजबूत करना होगा और आने वाले वर्षों में काम करने की गति कई गुना बढ़ानी होगी।
प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश के लिए दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भर रहना जोखिम पैदा कर सकता है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में महामारी, युद्ध, व्यापारिक तनाव और पश्चिम एशिया में संघर्ष जैसी घटनाओं ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित किया है। ऐसे समय में भारत को ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, दवाइयों, उर्वरकों, अर्धचालकों और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी।
उन्होंने कहा कि दुनिया में कई वस्तुएं ऐसी हैं जो दूसरे देशों से सस्ती और तेजी से उपलब्ध हो सकती हैं, लेकिन केवल आयात पर निर्भर रहने से देश की उत्पादन क्षमता और आत्मविश्वास मजबूत नहीं होता। भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
ऊर्जा सुरक्षा को बताया समय की सबसे बड़ी आवश्यकता
प्रधानमंत्री ने ऊर्जा सुरक्षा को विकसित भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि आज की अर्थव्यवस्था अर्धचालक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विशाल आंकड़ा केंद्रों पर तेजी से निर्भर हो रही है। इन सभी क्षेत्रों के विस्तार के लिए बड़ी मात्रा में भरोसेमंद और निरंतर बिजली की आवश्यकता होगी। इसलिए भारत को ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।
परमाणु ऊर्जा को ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि संसद द्वारा शांति अधिनियम पारित किए जाने के बाद परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में नए अवसरों का रास्ता खुला है। भारत ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसी दशक के भीतर पांच नए परमाणु रिएक्टर शुरू करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत ने तीव्र प्रजनक परमाणु तकनीक में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इससे परमाणु ईंधन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में देश को मजबूती मिलेगी।
समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज
प्रधानमंत्री ने समुद्री क्षेत्र में तेल और गैस की खोज को भी ऊर्जा आत्मनिर्भरता से जोड़ा। उन्होंने बताया कि पहले जिन क्षेत्रों को खोज और उत्पादन गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित माना जाता था, उनमें से 99 प्रतिशत क्षेत्र अब खोज के लिए खोल दिए गए हैं।
भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का 88 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जबकि प्राकृतिक गैस की जरूरत का लगभग आधा हिस्सा विदेशों से पूरा होता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री ने समुद्र मंथन योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि समुद्री संसाधनों की खोज को गति देने के लिए 85 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। सरकार का उद्देश्य समुद्र में उपलब्ध संभावित ऊर्जा संसाधनों की पहचान और उनके जिम्मेदार उपयोग को बढ़ाना है।
अर्धचालक निर्माण में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य
तकनीकी क्षेत्र में अर्धचालकों की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, चिकित्सा उपकरणों और परिवहन प्रणालियों से लेकर आधुनिक अर्थव्यवस्था के लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में इनकी आवश्यकता है। अर्धचालक आपूर्ति बाधित होने पर पूरी उत्पादन व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
भारत ने घरेलू अर्धचालक निर्माण क्षमता विकसित करने की दिशा में काम तेज कर दिया है। प्रधानमंत्री के अनुसार तीन प्रमुख अर्धचालक संयंत्रों में उत्पादन शुरू हो चुका है और वहां निर्मित सामग्री का निर्यात भी आरंभ हो गया है। आने वाले सात से आठ वर्षों में कई और अर्धचालक संयंत्रों के शुरू होने की संभावना है।
उन्होंने कहा कि अर्धचालक क्षेत्र में मजबूत घरेलू क्षमता भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान दिला सकती है।
महत्वपूर्ण खनिजों पर बढ़ा ध्यान
तकनीकी और औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता भी आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने कहा कि आधुनिक तकनीक पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए इन खनिजों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। भारत ने इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन शुरू किया है।
सरकार ने महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े लक्ष्यों को निर्धारित करने के साथ-साथ खनिज गलियारे की योजना भी आगे बढ़ाई है। विभिन्न देशों के साथ महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति और सहयोग से संबंधित समझौते किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य देश की औद्योगिक और तकनीकी जरूरतों के लिए आवश्यक संसाधनों की सुरक्षित उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
विनिर्माण और निर्यात को वैश्विक स्तर तक पहुंचाने की तैयारी
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को केवल अंतिम उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि छोटे घटकों से लेकर बड़े उत्पादों तक पूरी मूल्य श्रृंखला विकसित करनी होगी। डिजाइन से लेकर निर्माण तक भारत को वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में भरोसेमंद केंद्र के रूप में स्थापित करना होगा।
उन्होंने निर्माताओं, उद्यमियों और सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों से गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय उत्पादों की पहचान विश्व बाजार में विश्वसनीयता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमत से होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत के निर्यात को बढ़ाने के लिए वैश्विक मानकों से आगे निकलना जरूरी है। भारतीय वस्त्र, मशीनरी, दवाइयां और अन्य उत्पादों को दुनिया के बाजारों तक पहुंचाने के लिए व्यापार समझौतों से मिले अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार में वैश्विक नेतृत्व
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम तकनीक, अंतरिक्ष, रोबोटिक्स और आंकड़ा केंद्रों के क्षेत्र में केवल उपभोक्ता बाजार नहीं बनना चाहिए। देश को इन क्षेत्रों में वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में उभरना होगा।
उन्होंने भारत की डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्था और एकीकृत भुगतान व्यवस्था की सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने तकनीक आधारित सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है। अब भारत को इन तकनीकी समाधानों को दुनिया के अधिक से अधिक देशों तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।
भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर पहुंचने का आह्वान
प्रधानमंत्री ने भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार पर भी जोर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगले दशक में भारत की 50 कंपनियां विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में क्यों नहीं हो सकतीं। उन्होंने भारतीय बैंकिंग, औषधि, प्रौद्योगिकी, विधि, परामर्श, लेखांकन और मूल्यांकन संस्थाओं को विश्व के अग्रणी संस्थानों में शामिल करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि भारतीय ब्रांडों को ऐसी वैश्विक पहचान बनानी चाहिए, जिससे दुनिया भारत की गुणवत्ता और क्षमता को पहचाने। इसके लिए उद्यमियों को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।
सात स्तंभों वाला विकास खाका
प्रधानमंत्री ने अगले पांच से सात वर्षों के लिए सात क्षेत्रों पर आधारित विकास खाका भी प्रस्तुत किया। इसमें विनिर्माण, कृषि और खाद्य उत्पादन, तकनीक और नवाचार, आधारभूत संरचना और संपर्क व्यवस्था, रक्षा, हरित और समुद्री अर्थव्यवस्था तथा भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक शक्ति को प्रमुख स्थान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि अगले 25 वर्ष भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है और अब देश के पास अपनी विकास गति को तेज करने का बड़ा अवसर है।
प्रधानमंत्री ने सुधारों को केवल मजबूरी या राजनीतिक नारा मानने के बजाय विश्वास से जुड़ा विषय बताया। उन्होंने कहा कि भारत सुधारों की नई गति के साथ आगे बढ़ रहा है और अब अगले स्तर के सुधारों की आवश्यकता है।
उन्होंने देशवासियों से कार्य संस्कृति, सोच और काम करने की गति में बदलाव लाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री के अनुसार, जिन कार्यों को पूरा करने में पिछले कई दशकों का समय लगा, उन्हें आने वाले पांच से सात वर्षों में तेज गति से पूरा करना होगा। आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता, गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को साथ लेकर भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।


