भारत जैव विविधता से समृद्ध देशों में शामिल है। यहां घने जंगलों में रहने वाली बड़ी बिल्लियों से लेकर ऊंचे हिमालय में विचरण करने वाले दुर्लभ शिकारी और नदियों में रहने वाले विशेष प्रकार के सरीसृप तक, वन्यजीवों की असाधारण विविधता देखने को मिलती है। लेकिन तेजी से बदलते पर्यावरण, जंगलों का घटता क्षेत्र, बढ़ती मानवीय गतिविधियां, अवैध शिकार, वन्यजीवों की तस्करी और जलवायु परिवर्तन ने कई प्रजातियों के अस्तित्व के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
ऐसी परिस्थितियों में वन्यजीवों को कानूनी संरक्षण देना संरक्षण व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में वर्ष 2022 में किए गए संशोधनों के बाद विभिन्न प्रजातियों को अलग-अलग अनुसूचियों में रखा गया है। वर्तमान व्यवस्था में पहली अनुसूची में शामिल प्रजातियों को सर्वोच्च स्तर का कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
इस संरक्षण का उद्देश्य केवल किसी एक पशु को शिकारियों से बचाना नहीं है, बल्कि उन प्राकृतिक क्षेत्रों और पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करना भी है, जिन पर इन प्रजातियों का अस्तित्व निर्भर करता है।
वन्यजीव छायाकार और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इंद्रजीत घोरपड़े का मानना है कि किसी प्रजाति को कानूनी संरक्षण देना संरक्षण की शुरुआत भर है। उनके अनुसार जंगल, प्राकृतिक आवास, वन्यजीव गलियारे और उन क्षेत्रों से जुड़ी मानवीय गतिविधियों को भी नियंत्रित करना जरूरी है।
- बंगाल बाघ
बंगाल बाघ भारत की सबसे पहचानी जाने वाली वन्यजीव प्रजातियों में से एक है। यह न केवल देश की प्राकृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि पूरे वन पारिस्थितिक तंत्र में शीर्ष शिकारी की भूमिका भी निभाता है।
बाघों को कई प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है। जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने से उनके आवास सिकुड़ते हैं। इसके अलावा अवैध शिकार, शिकार बनने वाले अन्य वन्यजीवों की संख्या में कमी और मनुष्यों के साथ बढ़ता संघर्ष भी बड़ी चुनौतियां हैं।
घोरपड़े के अनुसार बाघ और हिम तेंदुए जैसे शीर्ष शिकारी विशेष संरक्षण के पात्र हैं क्योंकि उनका पारिस्थितिक महत्व बहुत अधिक है और उनकी संख्या तथा आवास दोनों संवेदनशील हैं।
भारत में बाघ संरक्षण का सबसे उल्लेखनीय उदाहरण बाघ परियोजना रही है। केंद्रित संरक्षण प्रयासों के कारण कई क्षेत्रों में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। लेकिन संरक्षण की सफलता अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आई है।
कुछ क्षेत्रों में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ उनके लिए उपयुक्त क्षेत्र सीमित होने लगे हैं। जब सुरक्षित जंगलों में पर्याप्त स्थान नहीं रहता, तो बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकल सकते हैं। इससे मनुष्यों और बाघों के बीच संघर्ष बढ़ने की संभावना रहती है।
इसलिए बाघों की रक्षा के साथ-साथ नए सुरक्षित क्षेत्र, प्राकृतिक गलियारे और पर्याप्त आवास उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
- एशियाई सिंह
एशियाई सिंह भारत के सबसे दुर्लभ बड़े मांसाहारी जीवों में से एक है। इसकी जंगली आबादी मुख्य रूप से गुजरात के गिर और उसके आसपास के क्षेत्रों में केंद्रित है।
यही सीमित भौगोलिक वितरण इस प्रजाति के लिए एक बड़ी कमजोरी बन जाता है। यदि किसी बीमारी, प्राकृतिक आपदा, पर्यावरणीय बदलाव या किसी अन्य गंभीर घटना का प्रभाव इस सीमित क्षेत्र पर पड़ता है, तो बड़ी संख्या में सिंह प्रभावित हो सकते हैं।
घोरपड़े के अनुसार सिंहों की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक उनका बेहद सीमित प्राकृतिक क्षेत्र है। उनका मानना है कि बढ़ती आबादी के लिए अधिक स्थान और सुरक्षित क्षेत्र उपलब्ध कराना आवश्यक है।
किसी प्रजाति की संख्या बढ़ना संरक्षण की सफलता का संकेत जरूर है, लेकिन उसके साथ पर्याप्त प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। अधिक सिंहों के लिए अधिक क्षेत्र चाहिए। ऐसे में नए उपयुक्त आवास, सुरक्षित गलियारे और विस्तारित प्राकृतिक क्षेत्र संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
- हिम तेंदुआ
भारत के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला हिम तेंदुआ दुनिया के सबसे रहस्यमय और कठिन परिस्थितियों में रहने वाले वन्यजीवों में से एक है। यह अत्यधिक ठंडे और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रहने के लिए विशेष रूप से अनुकूलित है।
दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रहने के बावजूद हिम तेंदुआ मानवीय गतिविधियों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। प्राकृतिक आवास में बदलाव, शिकार बनने वाले पशुओं की संख्या में कमी, प्रतिशोध में की जाने वाली हत्याएं और अवैध वन्यजीव व्यापार इसके सामने मौजूद प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं।
हिम तेंदुए का संरक्षण केवल उसकी सुरक्षा तक सीमित नहीं रह सकता। उसके प्राकृतिक क्षेत्र में पर्याप्त भोजन, सुरक्षित विश्राम स्थल और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाए रखना भी आवश्यक है।
पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण, संसाधनों का अत्यधिक उपयोग और मानव गतिविधियों का विस्तार वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए हिम तेंदुए की रक्षा के लिए पूरे पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण जरूरी है।
- भारतीय एक सींग वाला गैंडा
भारतीय या एक सींग वाला गैंडा कभी बड़े पैमाने पर शिकार और आवास के नुकसान का सामना कर चुका है। इसके सींग के लिए अवैध शिकार ने लंबे समय तक इस प्रजाति के अस्तित्व को गंभीर खतरे में रखा।
संरक्षित क्षेत्रों में चलाए गए प्रभावी संरक्षण प्रयासों और शिकार विरोधी उपायों के कारण इसकी आबादी को कई स्थानों पर बेहतर स्थिति मिली है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि खतरे पूरी तरह समाप्त हो गए हैं।
गैंडे की संख्या बढ़ने के साथ उसके लिए पर्याप्त प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध कराना आवश्यक है। यदि आबादी बढ़ती है लेकिन आवास का विस्तार नहीं होता, तो भोजन, पानी और सुरक्षित क्षेत्र को लेकर दबाव बढ़ सकता है।
घोरपड़े के अनुसार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत चलाए गए संरक्षण कार्यक्रमों ने कई प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन संरक्षण का अगला चरण अधिक प्रजातियों को सुरक्षा देने, पर्याप्त धन उपलब्ध कराने, विशेषज्ञता बढ़ाने और प्राकृतिक क्षेत्रों का विस्तार करने से जुड़ा होना चाहिए।
- घड़ियाल
घड़ियाल इन पांच प्रजातियों में सबसे अलग है। जहां बाघ, सिंह, हिम तेंदुआ और गैंडा स्थलीय क्षेत्र से जुड़े हैं, वहीं घड़ियाल का जीवन स्वस्थ नदी तंत्र पर निर्भर करता है।
घड़ियाल की लंबी और विशेष प्रकार की थूथन वाली बनावट इसे अन्य मगरमच्छ प्रजातियों से अलग पहचान देती है। इसका अस्तित्व नदियों में पर्याप्त भोजन, स्वच्छ पानी और सुरक्षित प्रजनन क्षेत्रों पर निर्भर करता है।
नदियों में प्रदूषण, प्राकृतिक नदी तटों में बदलाव, रेत का अत्यधिक खनन, मछली पकड़ने का दबाव और मछली पकड़ने वाले जाल में गलती से फंसना घड़ियाल के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकते हैं।
इसलिए घड़ियाल संरक्षण का अर्थ केवल कुछ घड़ियालों को बचाना नहीं है। इसके लिए पूरी नदी और उसके आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र की रक्षा करनी होगी।
यदि नदी का प्रवाह, तट, भोजन और प्रजनन स्थल सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो केवल कानूनी संरक्षण घड़ियाल की आबादी को लंबे समय तक बचाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
पहली अनुसूची का संरक्षण क्यों महत्वपूर्ण है?
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम भारत में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रमुख कानूनी आधार प्रदान करता है। वर्तमान व्यवस्था में पहली अनुसूची में शामिल प्रजातियों को सर्वोच्च स्तर का कानूनी संरक्षण दिया जाता है।
इस व्यवस्था के माध्यम से शिकार, अवैध व्यापार और वन्यजीव अपराधों पर कठोर कार्रवाई का कानूनी आधार मिलता है। इसके अलावा संरक्षित क्षेत्रों और वन्यजीवों के संरक्षण से जुड़े अन्य प्रावधान भी इसी व्यापक कानूनी ढांचे का हिस्सा हैं।
हालांकि, केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। प्रभावी संरक्षण के लिए कानून का जमीन पर सही तरीके से पालन होना भी जरूरी है।
सिर्फ संरक्षित क्षेत्र पर्याप्त नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीवों की बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध कराना भविष्य की बड़ी आवश्यकता है। कई बार किसी प्रजाति को एक संरक्षित क्षेत्र में सुरक्षित रखने के बावजूद आसपास के इलाकों में उसका प्राकृतिक आवास सीमित हो जाता है।
ऐसे में वन्यजीव गलियारे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये प्राकृतिक क्षेत्र अलग-अलग जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों को जोड़ने में मदद करते हैं और वन्यजीवों को सुरक्षित रूप से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जाने का अवसर देते हैं।
इसके साथ सामुदायिक संरक्षण क्षेत्र, बचाव केंद्र, वैज्ञानिक आधार पर प्रजनन कार्यक्रम, सड़क पार करने के सुरक्षित उपाय और अवैध शिकार पर प्रभावी कार्रवाई भी आवश्यक है।
स्थानीय समुदायों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
वन्यजीव संरक्षण की सफलता स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना मुश्किल हो सकती है। जंगलों और वन्यजीवों के आसपास रहने वाले समुदायों की आजीविका, सुरक्षा और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संरक्षण नीतियां तैयार करना आवश्यक है।
यदि बाघ, सिंह, हाथी या अन्य वन्यजीवों के कारण स्थानीय लोगों को लगातार आर्थिक नुकसान या सुरक्षा संबंधी समस्या होती है, तो मानव और वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है।
इसलिए संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों के लिए उचित सहायता, जागरूकता और भागीदारी की व्यवस्था जरूरी है।
संरक्षण का लक्ष्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं
किसी प्रजाति की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से संरक्षण की सफलता का संकेत है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता का वास्तविक आधार स्वस्थ प्राकृतिक आवास है।
बाघों के लिए पर्याप्त जंगल और शिकार क्षेत्र, सिंहों के लिए नए सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र, हिम तेंदुए के लिए स्वस्थ पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र, गैंडों के लिए पर्याप्त घासभूमि और घड़ियाल के लिए स्वच्छ एवं प्राकृतिक नदी तंत्र आवश्यक हैं।
इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण नीतियों को केवल पशुओं की संख्या पर केंद्रित करने के बजाय उनके पूरे प्राकृतिक जीवन क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए।
आगे की चुनौती
भारत में वन्यजीव संरक्षण ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन बदलती जलवायु, बढ़ती आबादी, बुनियादी ढांचे का विस्तार और प्राकृतिक आवासों पर दबाव आने वाले वर्षों में नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
पहली अनुसूची के अंतर्गत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण पाने वाली प्रजातियों की सुरक्षा के लिए मजबूत निगरानी, पर्याप्त वित्तीय संसाधन, विशेषज्ञों की भागीदारी और स्थानीय समुदायों का सहयोग जरूरी होगा।
बाघ, एशियाई सिंह, हिम तेंदुआ, भारतीय एक सींग वाला गैंडा और घड़ियाल केवल अलग-अलग वन्यजीव नहीं हैं। ये भारत के विविध पारिस्थितिक तंत्रों की सेहत के महत्वपूर्ण संकेतक भी हैं। इनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करके न केवल इन प्रजातियों को बचाया जा सकता है, बल्कि उन जंगलों, नदियों और पर्वतीय क्षेत्रों को भी सुरक्षित रखा जा सकता है जिन पर असंख्य अन्य जीव और मानव समुदाय निर्भर हैं।
इसलिए सर्वोच्च कानूनी संरक्षण का वास्तविक उद्देश्य केवल वन्यजीवों को कानून के दायरे में सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा प्राकृतिक वातावरण देना है जिसमें वे स्वतंत्र रूप से भोजन कर सकें, प्रजनन कर सकें और अपनी आने वाली पीढ़ियों के साथ जीवित रह सकें।


