भारतीय संसद ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित कर दिया है। इस विधेयक का उद्देश्य देश की सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाना है। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) सहित सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी जाएगी।
लोकसभा से पारित होने के बाद बुधवार को राज्यसभा ने भी इस विधेयक को मंजूरी दे दी। हालांकि, इस विधेयक को मनी बिल (Money Bill) के रूप में पारित किए जाने को लेकर एक बार फिर संवैधानिक बहस तेज हो गई है। कई संवैधानिक विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का मानना है कि इस प्रकार के विधेयक को मनी बिल के रूप में लाना संविधान की भावना के अनुरूप है या नहीं, यह प्रश्न अभी भी न्यायिक विचाराधीन है।
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकार का कहना है कि देश में लगातार बढ़ते मुकदमों और लंबित मामलों के बोझ को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना आवश्यक हो गया है। अधिक न्यायाधीश नियुक्त होने से मामलों की सुनवाई की गति तेज हो सकती है और लंबित मामलों के निपटारे में मदद मिलने की उम्मीद है।
विधेयक के उद्देश्य और कारण (Statement of Objects and Reasons) में कहा गया है कि चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ उनके वेतन, भत्ते, स्टाफ, सरकारी आवास, सुरक्षा और अन्य प्रशासनिक सुविधाओं पर अतिरिक्त खर्च होगा।
सरकार के अनुमान के अनुसार—
चार नए न्यायाधीशों तथा उनके स्टाफ पर वार्षिक आवर्ती खर्च लगभग ₹10.56 करोड़ होगा।
सरकारी आवास की साज-सज्जा, वाहन और अन्य प्रारंभिक व्यवस्थाओं पर लगभग ₹3.47 करोड़ का एकमुश्त खर्च आएगा।
इस प्रकार कुल अनुमानित अतिरिक्त व्यय करीब ₹14.04 करोड़ होगा।
सरकार का तर्क है कि चूंकि इस विधेयक का सीधा संबंध सरकारी व्यय और भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से होने वाले खर्च से है, इसलिए इसे मनी बिल के रूप में पेश किया गया।
मनी बिल क्या होता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 110 (Article 110) मनी बिल की परिभाषा और उससे संबंधित प्रावधानों को निर्धारित करता है।
संविधान के अनुसार, ऐसा विधेयक जो मुख्य रूप से निम्नलिखित विषयों से संबंधित हो, मनी बिल माना जा सकता है—
कर (Taxation) लगाना, समाप्त करना या उसमें संशोधन करना।
भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) या आकस्मिक निधि (Contingency Fund) से धन निकालना या उसका विनियोजन।
सरकारी उधारी या वित्तीय दायित्व।
उपरोक्त विषयों से संबंधित सहायक (Incidental) प्रावधान।
किसी विधेयक को मनी बिल घोषित करने का अंतिम अधिकार लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के पास होता है।
मनी बिल की प्रक्रिया क्यों अलग होती है?
मनी बिल केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
यदि लोकसभा अध्यक्ष किसी विधेयक को मनी बिल प्रमाणित कर देते हैं, तो—
राज्यसभा उसे अस्वीकार नहीं कर सकती।
राज्यसभा केवल सुझाव दे सकती है।
लोकसभा चाहे तो उन सुझावों को स्वीकार करे या न करे।
14 दिनों के भीतर यदि राज्यसभा विधेयक वापस नहीं भेजती, तो उसे स्वतः पारित माना जाता है।
यही कारण है कि मनी बिल की प्रक्रिया सामान्य विधेयकों की तुलना में काफी अलग और अधिक शक्तिशाली मानी जाती है।
इस विधेयक को लेकर विवाद क्यों है?
यही सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न है।
हालांकि इस विधेयक में अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से होने वाले सरकारी खर्च का उल्लेख किया गया है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका मूल उद्देश्य न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना है, न कि केवल सरकारी व्यय का प्रबंधन।
उनका तर्क है कि केवल इसलिए किसी विधेयक को मनी बिल नहीं माना जा सकता क्योंकि उसके लागू होने से सरकार पर खर्च आएगा।
यही मुद्दा फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है।
सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित है बड़ा संवैधानिक सवाल
सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से यह महत्वपूर्ण प्रश्न विचाराधीन है कि किन परिस्थितियों में किसी विधेयक को मनी बिल घोषित किया जा सकता है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने वर्ष 2023 में कहा था कि इस मामले की जल्द सुनवाई होगी, लेकिन अब तक संविधान पीठ ने इस पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
इसलिए वर्तमान संशोधन विधेयक को मनी बिल के रूप में पारित किए जाने से यह बहस फिर तेज हो गई है।
आधार कानून से जुड़ा रहा है सबसे बड़ा विवाद
मनी बिल को लेकर सबसे बड़ा विवाद आधार अधिनियम (Aadhaar Act) के समय सामने आया था।
केंद्र सरकार ने आधार कानून को मनी बिल के रूप में पारित किया था। सरकार का तर्क था कि आधार के माध्यम से दी जाने वाली सब्सिडी भारत की संचित निधि से दी जाती है, इसलिए यह मनी बिल की श्रेणी में आता है।
हालांकि, उस समय सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बहुमत से आधार कानून को बरकरार रखा, लेकिन तत्कालीन न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने अपने असहमति (Dissent) वाले निर्णय में इसे “संविधान के साथ धोखा” (Fraud on the Constitution) और “Subterfuge” यानी संवैधानिक प्रक्रिया से बचने का तरीका बताया था।
किन अन्य कानूनों पर भी उठे हैं सवाल?
मनी बिल के उपयोग को लेकर कई महत्वपूर्ण कानूनों की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठ चुके हैं।
इनमें प्रमुख हैं—
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) से जुड़े कुछ प्रावधान।
आधार अधिनियम (Aadhaar Act)।
2017 के ट्रिब्यूनल सुधार संशोधन, जिनमें विभिन्न न्यायाधिकरणों के सदस्यों की सेवा शर्तों में बदलाव किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल संशोधनों को न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रभाव डालने वाला मानते हुए असंवैधानिक घोषित किया था। हालांकि, इन मामलों में भी मनी बिल से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्न को बड़ी संविधान पीठ के लिए छोड़ दिया गया था।
सरकार और विपक्ष के अलग-अलग तर्क
सरकार का कहना है कि जब किसी विधेयक का सीधा संबंध सरकारी वित्तीय दायित्व और संचित निधि से होने वाले खर्च से हो, तो उसे मनी बिल के रूप में लाना संविधान के अनुरूप है।
वहीं विपक्ष और कई संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि मनी बिल की परिभाषा का अत्यधिक विस्तार किया गया, तो राज्यसभा की विधायी भूमिका कमजोर हो सकती है और द्विसदनीय संसदीय व्यवस्था (Bicameral Legislature) की भावना प्रभावित हो सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
चूंकि मनी बिल की संवैधानिक सीमा और उसकी व्याख्या से जुड़ा मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट की बड़ी संविधान पीठ के समक्ष लंबित है, इसलिए भविष्य में आने वाला निर्णय न केवल इस विधेयक बल्कि अन्य कई कानूनों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
फिलहाल संसद द्वारा पारित सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर लंबित मामलों के बोझ को कम करना है। हालांकि, इसे मनी बिल के रूप में पारित किए जाने से एक बार फिर संविधान, संसद की प्रक्रिया और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी एवं संवैधानिक बहस शुरू हो गई है।


