महाराष्ट्र में सरकारी ठेकेदारों और इंजीनियरों का भुगतान बकाया रहने का मुद्दा अब बड़े विरोध प्रदर्शन में बदल गया है। मंगलवार को मुंबई के आजाद मैदान में हजारों सरकारी ठेकेदारों और इंजीनियरों ने प्रदर्शन करते हुए राज्य सरकार से करीब Rs. 86,662 करोड़ के लंबित भुगतान को जल्द जारी करने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें एक साल से अधिक समय से विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के भुगतान का इंतजार करना पड़ रहा है। लंबे समय से बिलों का भुगतान नहीं होने के कारण हजारों छोटी और मध्यम आकार की कंपनियां तथा उनसे जुड़े कर्मचारी कथित तौर पर गंभीर आर्थिक संकट में पहुंच गए हैं।
यह विरोध प्रदर्शन Maharashtra State Government Contractors’ Federation द्वारा आयोजित दो दिवसीय राज्यव्यापी आंदोलन का हिस्सा है। ठेकेदारों ने महायुति सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकारी परियोजनाओं और टेंडर की मौजूदा व्यवस्था से बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंच रहा है, जबकि छोटे और मध्यम ठेकेदारों के लिए काम हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है।
Rs. 86,662 करोड़ के भुगतान की मांग
ठेकेदारों का सबसे बड़ा मुद्दा सरकारी विभागों द्वारा किए गए कामों के लंबित भुगतान को लेकर है। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, उन्होंने सड़क, भवन, सिंचाई और अन्य सरकारी परियोजनाओं में काम पूरा किया, लेकिन उनके बिल लंबे समय से अटके हुए हैं।
ठेकेदारों का कहना है कि लंबे समय तक भुगतान नहीं मिलने से उनके सामने कर्मचारियों की सैलरी, मशीनरी का खर्च, सामग्री खरीद और बैंक लोन की किस्तें चुकाने जैसी समस्याएं खड़ी हो गई हैं।
फेडरेशन का दावा है कि महाराष्ट्र में तीन लाख से अधिक छोटे, मध्यम और बड़े ठेकेदार सरकारी परियोजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े हैं। ऐसे में भुगतान में देरी का असर केवल ठेकेदारों तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों कर्मचारियों, मजदूरों, सप्लायर्स और संबंधित कारोबारों पर भी पड़ सकता है।
PWD के बकाये पर सरकार ने बनाई व्यवस्था
ठेकेदारों के प्रदर्शन के बीच महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को एक अहम कदम उठाया। राज्य मंत्रिमंडल ने Public Works Department (PWD) के लंबित भुगतान को निपटाने के लिए एक mechanism को मंजूरी दी।
सरकार के इस फैसले को ठेकेदारों की समस्या के समाधान की दिशा में संभावित कदम माना जा रहा है। हालांकि, प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि लंबित राशि जल्द से जल्द उनके खातों में पहुंचाई जाए।
अब उद्योग की नजर इस बात पर है कि सरकार द्वारा मंजूर की गई व्यवस्था किस तरह लागू होती है और इससे कितने समय में ठेकेदारों के बकाये का भुगतान शुरू होता है।
ठेकेदारों का आरोप—बड़ी कंपनियों को फायदा
आजाद मैदान में प्रदर्शन कर रहे ठेकेदारों ने सरकार की tender policy पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि ऐसी नीतियां बनाई जा रही हैं जिनसे छोटे और मध्यम ठेकेदारों के लिए सरकारी परियोजनाओं में भाग लेना मुश्किल हो रहा है।
नासिक के ठेकेदार रंजीत शिंदे ने आरोप लगाया कि राज्य में एक तरह की “anti-small and medium contractor policy” लागू की जा रही है।
उनका दावा है कि पहले जिन परियोजनाओं को अलग-अलग contractors को दिया जाता था, उन्हें अब बड़े पैकेज में क्लब किया जा रहा है। इससे छोटे ठेकेदारों के लिए उन टेंडर में qualify करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि बड़े projects के लिए अधिक वित्तीय और तकनीकी क्षमता की जरूरत होती है।
छोटे ठेकेदारों के काम पर असर का दावा
रंजीत शिंदे ने आरोप लगाया कि बड़ी कंपनियां जब ऐसे बड़े सरकारी contracts हासिल कर लेती हैं, तो बाद में वास्तविक काम का एक हिस्सा छोटे contractors को outsource कर देती हैं।
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि ऐसी व्यवस्था में छोटे contractors को काम तो मिल सकता है, लेकिन उन्हें बड़े contractors के अधीन काम करना पड़ता है और मुनाफे का बड़ा हिस्सा मुख्य contractor के पास चला जाता है।
हालांकि, इन आरोपों पर सरकार की ओर से कोई ऐसा विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है जिसमें प्रत्येक आरोप का अलग-अलग खंडन किया गया हो। सरकार का कहना है कि वह ठेकेदारों के लंबित भुगतान की समस्या को सुलझाने के लिए काम कर रही है।
चुनावी योजनाओं पर भी उठाए सवाल
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि सरकार की विभिन्न welfare schemes और 2024 Maharashtra Assembly elections से पहले घोषित योजनाओं तथा मुफ्त सुविधाओं पर हुए खर्च का असर contractors के payments पर पड़ा है।
उनका कहना है कि सरकारी खजाने से अलग-अलग योजनाओं के लिए बड़ी रकम आवंटित किए जाने के बीच infrastructure projects से जुड़े ठेकेदारों के बिलों का भुगतान प्रभावित हुआ।
हालांकि, यह प्रदर्शनकारियों का आरोप है और सरकार ने इसे ठेकेदारों के बकाये का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना है। वित्तीय प्राथमिकताओं और सरकारी भुगतान की वास्तविक स्थिति का आकलन सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
विपक्ष भी प्रदर्शन में शामिल
ठेकेदारों के आंदोलन को विपक्षी नेताओं का भी समर्थन मिला। NCP (SP) नेता रोहित पवार मुंबई के आजाद मैदान में प्रदर्शन कर रहे contractors के बीच पहुंचे और उनकी मांगों का समर्थन किया।
रोहित पवार ने दावा किया कि ठेकेदारों के करीब ₹90,000 करोड़ के बिल तीन से आठ वर्षों तक लंबित रहे हैं। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भुगतान नहीं होने से कई contractors गंभीर financial distress में पहुंच गए हैं।
पवार के मुताबिक, इस मुद्दे को मंत्रियों और महाराष्ट्र विधानसभा में भी उठाया गया है, लेकिन उनके आरोप के अनुसार सरकार की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़े रहने और उनकी मांगों का समाधान होने तक साथ देने की बात कही।
कांग्रेस ने भी किया समर्थन
कांग्रेस नेता नसीम खान ने भी प्रदर्शनकारी contractors का समर्थन किया। उन्होंने दावा किया कि कई engineers ने रोजगार पैदा करने और अपना काम शुरू करने के उद्देश्य से contracting business में कदम रखा था।
उनका आरोप है कि 2023-24 के दौरान महाराष्ट्र में सरकारी projects को पूरा करने वाले कई contractors को अभी तक Rs. 90,000 करोड़ से अधिक का भुगतान नहीं मिला है।
विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार समय पर contractors के बिलों का भुगतान नहीं करती है, तो इसका असर infrastructure projects की गति और रोजगार पर भी पड़ सकता है।
सरकार ने कहा—बकाया भुगतान किया जाएगा
दूसरी ओर, महाराष्ट्र सरकार ने ठेकेदारों की समस्या को हल करने की प्रतिबद्धता जताई है। राज्यमंत्री वित्त आशीष जायसवाल ने कहा कि सरकार विभिन्न welfare schemes को लागू कर रही है और किसानों समेत समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए हजारों करोड़ रुपये आवंटित कर रही है।
उन्होंने आश्वासन दिया कि contractors के लंबित dues का समाधान किया जाएगा और प्रदर्शनकारियों से अपना आंदोलन वापस लेने की अपील की।
सरकार का यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य कैबिनेट ने PWD के pending dues को clear करने के लिए mechanism को मंजूरी दी है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार द्वारा मंजूर mechanism से लंबित भुगतान कितनी तेजी से जारी हो पाएगा। Contractors Federation ने दो दिवसीय राज्यव्यापी agitation शुरू किया है, इसलिए आने वाले दिनों में सरकार और contractors के बीच बातचीत महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि लंबित राशि के भुगतान की प्रक्रिया तेज होती है, तो इससे contractors, suppliers, workers और infrastructure sector से जुड़े अन्य लोगों को राहत मिल सकती है। लेकिन यदि भुगतान में फिर देरी होती है, तो आंदोलन और तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
महाराष्ट्र में सरकारी contractors का यह आंदोलन केवल बकाये की राशि तक सीमित नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने tender policy, छोटे और मध्यम contractors के लिए अवसर तथा सरकारी expenditure priorities पर भी सवाल उठाए हैं।
फिलहाल सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर बड़े पैमाने पर लंबित contractors’ dues को निपटाना और दूसरी ओर सरकारी परियोजनाओं की execution तथा भविष्य के tenders में छोटे और मध्यम contractors की भागीदारी को लेकर उठ रही चिंताओं का समाधान करना।


