Saturday, September 26, 2026

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IAS Deepti Gaur Mukherjee बनीं नई शिक्षा सचिव, जानें पूरा प्रोफाइल

केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग में बड़ा प्रशासनिक बदलाव करते हुए 1993 बैच की मध्य प्रदेश संवर्ग की वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी दीप्ति गौर मुखर्जी को नया सचिव नियुक्त किया है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे ठीक कुछ सप्ताह पहले राजस्थान संवर्ग के 1994 बैच के अधिकारी नरेश पाल गंगवार को इसी पद की जिम्मेदारी दी गई थी। अब उनकी नियुक्ति को स्थगित कर दिया गया है और उनकी जगह दीप्ति गौर मुखर्जी को जिम्मेदारी सौंपी गई है। ताजा आदेश में गंगवार की नियुक्ति को स्थगित रखने की बात कही गई है, लेकिन उनके अगले दायित्व के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है।

यह प्रशासनिक बदलाव ऐसे समय हुआ है जब देश में उच्च शिक्षा, प्रवेश परीक्षाओं और परीक्षा संचालन व्यवस्था को लेकर सरकार पर लगातार निगाह बनी हुई है। ऐसे में उच्च शिक्षा विभाग के शीर्ष प्रशासनिक पद पर अचानक हुए बदलाव ने स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े किए हैं।

कौन हैं दीप्ति गौर मुखर्जी?

दीप्ति गौर मुखर्जी मध्य प्रदेश संवर्ग की वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं। उनका जन्म 3 फरवरी 1969 को उत्तर प्रदेश में हुआ था। वर्ष 1993 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल होने के बाद उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार के स्तर पर विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।

अपने लंबे प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान उन्होंने कार्मिक व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, खेल और युवा कल्याण सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम किया। मध्य प्रदेश सरकार में उन्होंने वरिष्ठ पदों पर रहते हुए प्रशासनिक कामकाज, नीतियों के क्रियान्वयन और शासन व्यवस्था से जुड़े विषयों को संभाला।

उनके लंबे अनुभव को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण प्रशासनिक नियुक्ति माना जा रहा है।

दीप्ति गौर मुखर्जी की शैक्षणिक योग्यता क्या है?

दीप्ति गौर मुखर्जी की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अर्थशास्त्र और लोक प्रबंधन से जुड़ी रही है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में परास्नातक की उपाधि हासिल की है।

इसके अलावा उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से लोक प्रबंधन और शासन विषय में विज्ञान स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। उनकी शिक्षा और तीन दशक से अधिक का प्रशासनिक अनुभव उन्हें नीति निर्माण और शासन से जुड़े जटिल विषयों को समझने में मदद करता है।

उच्च शिक्षा विभाग में नई जिम्मेदारी संभालते समय उनका यह अनुभव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि विभाग के सामने परीक्षा व्यवस्था में सुधार, उच्च शिक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली और विभिन्न नीतिगत विषयों से जुड़ी कई चुनौतियां हैं।

वर्ष 1993 से प्रशासनिक सफर

दीप्ति गौर मुखर्जी ने वर्ष 1993 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया। मध्य प्रदेश संवर्ग में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं।

वह कार्मिक और सामान्य प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण विभागों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुकी हैं। इसके अलावा खेल और युवा कल्याण से संबंधित विभागों में भी उनकी भूमिका रही है। इन जिम्मेदारियों के दौरान उन्हें प्रशासनिक प्रबंधन, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय जैसे विषयों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला।

राज्य सरकार में लंबे अनुभव के बाद उन्होंने केंद्र सरकार के स्तर पर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। यही प्रशासनिक पृष्ठभूमि अब उन्हें उच्च शिक्षा विभाग के शीर्ष पद पर काम करने में मदद कर सकती है।

केवल 17 दिनों में क्यों बदला गया सचिव?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि नरेश पाल गंगवार की नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद केंद्र सरकार को उच्च शिक्षा विभाग में नेतृत्व बदलने की जरूरत क्यों पड़ी।

गंगवार को 23 जुलाई 2026 को उच्च शिक्षा विभाग का सचिव नियुक्त किया गया था। उन्होंने विनीत जोशी का स्थान लिया था। इसके लगभग 17 दिन बाद उनकी नियुक्ति को स्थगित करते हुए दीप्ति गौर मुखर्जी को नया सचिव नियुक्त कर दिया गया। ताजा सरकारी आदेश में इस बदलाव का स्पष्ट कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है।

इसलिए फिलहाल यह कहना संभव नहीं है कि बदलाव किसी एक विशेष विवाद या आरोप के कारण किया गया। प्रशासनिक स्तर पर अचानक तबादले और नियुक्तियां कई कारणों से हो सकती हैं, लेकिन जब तक सरकार आधिकारिक रूप से कारण नहीं बताती, किसी एक वजह को अंतिम कारण मानना उचित नहीं होगा।

गंगवार से जुड़े अनुदान विवाद की चर्चा क्यों?

नरेश पाल गंगवार की नियुक्ति के बाद उनके परिवार से जुड़े बागवानी अनुदान को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा शुरू हुई थी। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि उनकी पत्नी, मां और बेटे को राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की व्यावसायिक बागवानी योजना के तहत कुल मिलाकर 1.16 करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान मिला था। इस मामले को लेकर हितों के संभावित टकराव से जुड़े सवाल उठाए गए थे।

हालांकि, इन आरोपों को अपने आप में किसी गलत काम का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार गंगवार ने किसी अनुचित कार्य से इनकार किया है। उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी मां और बेटा संबंधित सेवा नियमों के तहत उन पर आश्रित नहीं थे और उनकी पत्नी की संपत्ति से संबंधित आवश्यक जानकारी नियमानुसार घोषित की गई थी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने दीप्ति गौर मुखर्जी की नियुक्ति को इन अनुदान संबंधी आरोपों से आधिकारिक रूप से नहीं जोड़ा है। इसी तरह उपलब्ध सरकारी आदेश में गंगवार की नियुक्ति स्थगित करने का कारण भी स्पष्ट नहीं किया गया है।

शिक्षा विभाग के सामने बड़ी जिम्मेदारियां

दीप्ति गौर मुखर्जी ऐसे समय उच्च शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी संभाल रही हैं जब परीक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली, प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता और परीक्षा सुधार जैसे विषयों पर सरकार का विशेष ध्यान है।

नीट सहित प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं को लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंताओं के बीच उच्च शिक्षा विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में नई सचिव के सामने प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और परीक्षा से जुड़े संस्थानों के कामकाज में समन्वय बनाए रखने की चुनौती होगी।

इसके साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन, उच्च शिक्षण संस्थानों में सुधार, नियामकीय व्यवस्था और विद्यार्थियों से जुड़े विभिन्न मुद्दे भी विभाग की प्राथमिकताओं में बने रह सकते हैं।

अब नरेश पाल गंगवार का क्या होगा?

फिलहाल नरेश पाल गंगवार के अगले दायित्व को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। सरकार के आदेश में उनकी उच्च शिक्षा सचिव के रूप में नियुक्ति को स्थगित किया गया है, लेकिन उन्हें किसी अन्य विभाग में नई जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

इसका अर्थ यह भी नहीं है कि उन्हें सरकारी सेवा से हटा दिया गया है। उनकी अगली नियुक्ति या जिम्मेदारी के संबंध में सरकार की ओर से आगे कोई आदेश आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

नई नियुक्ति से क्या संकेत?

दीप्ति गौर मुखर्जी की नियुक्ति को फिलहाल एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। तीन दशक से अधिक के प्रशासनिक अनुभव और अर्थशास्त्र तथा लोक प्रबंधन की शैक्षणिक पृष्ठभूमि के साथ वह उच्च शिक्षा विभाग में नीति और प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को संभालेंगी।

हालांकि, गंगवार की नियुक्ति को केवल 17 दिनों के भीतर स्थगित किए जाने ने इस बदलाव को सामान्य प्रशासनिक फेरबदल से अधिक चर्चा में ला दिया है। सरकार की ओर से कारण स्पष्ट किए जाने तक इस बदलाव को लेकर अलग-अलग अटकलें लग सकती हैं, लेकिन उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर इतना ही स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा विभाग को नया प्रशासनिक नेतृत्व मिल गया है।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि दीप्ति गौर मुखर्जी उच्च शिक्षा विभाग की प्राथमिकताओं को किस तरह आगे बढ़ाती हैं और नरेश पाल गंगवार को केंद्र सरकार की ओर से अगली जिम्मेदारी क्या दी जाती है।

नोट: उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में पद का आधिकारिक नाम उच्च शिक्षा विभाग के सचिव के रूप में दिया गया है। गंगवार की नियुक्ति स्थगित करने का कारण सरकार ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया है

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