Monday, November 2, 2026

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लोकसभा ने सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक पारित किया

नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा ने सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इस विधेयक के जरिए देश के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) का पद भी शामिल है। सरकार का कहना है कि बढ़ते मामलों के बोझ को कम करने और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है।

हालांकि, इस महत्वपूर्ण विधेयक पर सदन में विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। विपक्षी दलों के सांसदों ने नीट (NEET) परीक्षा पेपर लीक मामले और राम मंदिर दान राशि में कथित अनियमितताओं को लेकर सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। लगातार हंगामे के कारण सदन का माहौल बाधित रहा और विधेयक को बिना बहस के ही मतदान के लिए प्रस्तुत किया गया।

अध्यादेश की जगह लाया गया विधेयक

यह विधेयक उस अध्यादेश (Ordinance) का स्थान लेने के लिए लाया गया था, जिसके माध्यम से केंद्र सरकार ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया था। भारतीय संविधान के अनुसार अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों से निर्धारित समय के भीतर मंजूरी मिलना आवश्यक होता है। इसी प्रक्रिया के तहत सरकार ने यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया।

सरकार का तर्क है कि देश में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय में अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति से मामलों की सुनवाई तेज होगी, न्याय मिलने में लगने वाला समय कम होगा और न्यायिक व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकेगी।

विपक्ष ने अध्यादेश का किया विरोध

विधेयक पेश किए जाने से पहले विपक्षी सांसदों ने अध्यादेश जारी किए जाने के तरीके का विरोध करते हुए एक वैधानिक प्रस्ताव (Statutory Resolution) भी पेश किया। इस प्रस्ताव में सरकार द्वारा अध्यादेश लाने की प्रक्रिया की आलोचना की गई और इसे वापस लेने की मांग की गई।

हालांकि, सदन में ध्वनिमत से इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। इसके बाद संशोधन विधेयक को भी ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।

कानून मंत्री ने रखा सरकार का पक्ष

केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक पेश करते हुए संक्षिप्त परिचय दिया। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में बढ़ते मामलों को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इससे न्यायपालिका की कार्यक्षमता में सुधार होगा और आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने में सहायता मिलेगी।

मंत्री के वक्तव्य के बाद पीठासीन अधिकारी ने विपक्षी सदस्यों को वैधानिक प्रस्ताव पर बोलने का अवसर देने की कोशिश की, लेकिन सदन में लगातार नारेबाजी जारी रही। इसके चलते चर्चा आगे नहीं बढ़ सकी और अंततः विधेयक को मतदान के लिए रखा गया।

हंगामे के बीच बिना चर्चा पारित हुआ विधेयक

संसद में सोमवार को कार्यवाही के दौरान विपक्षी दलों ने कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने का प्रयास किया। विपक्ष का मुख्य आरोप था कि सरकार नीट परीक्षा पेपर लीक मामले और राम मंदिर दान राशि से जुड़े आरोपों पर चर्चा से बच रही है।

लगातार विरोध और शोर-शराबे के कारण सदन में सामान्य बहस संभव नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण विधेयक को बिना विस्तृत चर्चा के ही पारित कर दिया गया।

पिछले सप्ताह भी बिना बहस पारित हुआ था एक विधेयक

यह पहला अवसर नहीं है जब संसद में किसी महत्वपूर्ण विधेयक को बिना बहस के मंजूरी मिली हो। पिछले सप्ताह भी जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक को विपक्ष के हंगामे के बीच बिना किसी विस्तृत चर्चा के पारित कर दिया गया था।

लगातार हो रहे राजनीतिक गतिरोध के कारण संसद में विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का अवसर नहीं मिल पा रहा है, जिस पर विपक्ष सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है।

न्यायपालिका पर क्या पड़ेगा असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों के निपटारे की गति तेज हो सकती है। वर्तमान में लाखों मामलों का बोझ न्यायपालिका पर है और सर्वोच्च न्यायालय में भी हजारों याचिकाएं लंबित हैं।

यदि सभी नए पदों पर शीघ्र नियुक्तियां की जाती हैं, तो इससे संविधान पीठों के गठन, महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई और आम नागरिकों को समयबद्ध न्याय मिलने में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

निष्कर्ष

लोकसभा द्वारा सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किए जाने के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, यह विधेयक विपक्ष के तीव्र विरोध और सदन में लगातार हंगामे के बीच बिना बहस के पारित हुआ। सरकार का मानना है कि इस फैसले से न्यायपालिका की कार्यक्षमता बढ़ेगी और लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे में मदद मिलेगी, जबकि विपक्ष संसद में पर्याप्त चर्चा न होने को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंताजनक बता रहा है।

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